Always remain optimistic.

  हमेशा आशावादी रहो। 

Always remain optimistic.

इस का महत्त्व नहीं है कि तुम्हें अपने काम के लक्ष्य को प्राप्त करने में कितनी असफलताएं मिली, तुम तो बस! अपनी सफलता के बारे में आशावादी रहो। यदि तुमने उचित कारण से लक्ष्य निर्धारित किया है, तो याद रखो कि इस पृथ्वी पर या स्वर्ग में ऐसी कोई ताकत नहीं है, जो तुम्हें तुम्हारी इच्छित वस्तु प्राप्त करने के लिए रोक सके। आवश्यकता है केवल भगवान में अटूट विश्वास के साथ दृढ़ निश्चय की। यह भी याद रखो कि तुम्हारे द्वारा किया गया छोटा सा प्रयत्न भी व्यर्थ नहीं जाता। यह प्रकृति का नियम है। कई तरह से किये गए प्रयत्न, संघर्ष व तुम्हारे द्वारा किया गया परिश्रम जल्दी या देर से निश्चय ही तुम्हेंं फल देगा। 

एक बहुत ही छोटा लगभग सात साल का बालक था। वह बहुत बुद्धिमान था। उसका नाम आलोक था। उसके पिता सेठ धनीराम एक व्यापारी थे। आलोक जब पांच वर्ष का था, तभी उसकी माँ उसे छोड़ कर भगवान के पास चली गयी। बेचारा आलोक अब हमेशा उदास रहने लगा। 

उसके पिता को जब व्यापार से समय मिलता, तो उसके साथ समय बिताते थे। यूँ तो आलोक के पिता आलोक से बहुत प्यार करते थे, किन्तु पत्नी की मृत्यु के बाद से आलोक को वे नफ़रत की दृष्टि से देखने लगे थे। आलोक को पढ़ाई बहुत अच्छी लगती थी। वह हमेशा अच्छी-अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करता था। आलोक बड़ा होकर अच्छा आदमी बनना चाहता था। देश के गरीबों, असहायों की मदद करना चाहता था। देश, धर्म और राष्ट्र के प्रति आदर्शवान था। अब आलोक 12 वर्ष का हो गया था।

           बेचारा आलोक! उसके सपनों को कौन पूरा कर सकता था? जब आलोक अपने पिता के पास जाता और अपनी कल्पनाओं को सुनाता, तो उसके पिता उसे डांट देते और घर के कार्यों में लगा देते थे। इस प्रकार आलोक मन ही मन रोता रहता था। कार्यों को पूरा कर लेने के बाद आलोक भगवान की प्रतिमा के पास बैठ जाता था। उसके पास एक बजरंगबली की प्रतिमा थी, वह उसी के साथ वह बातें करता था।

          एक बार की बात थी, आलोक के पिता को कुछ लोगों ने दूसरी शादी कर लेने को कहा। सेठ धनीराम ने ‘चंद्रमुखी’ नाम की स्त्री से शादी कर ली। चंद्रमुखी देखने में रूपवती स्त्री थी, किन्तु उसका चरित्र दुष्टतापूर्ण था। नाम तो उसका चंद्रमुखी था, लेकिन वह ज्वालामुखी से कम न थी। वह केवल अपना हित सोचती थी। किसी और की अछाई सुनना तो उसे बिल्कुल पसंद नही थी। वह किसी के सुख को देखना नहीं चाहती थी।

         इधर आलोक ने समझा कि उसकी दूसरी माँ उसे अपने पुत्र के समान प्यार देगी। आलोक चंद्रमुखी के पास बैठकर बातें करता था, परन्तु चंद्रमुखी उसे देखना तक नहीं चाहती थी। आलोक को लगा कि उसे माँ को पुनः पाकर नया जन्म मिल गया है। वह चंद्रमुखी को पूरी तरह समझ नहीं पाया था। 

चन्द्रमुखी आलोक के साथ नौकरों जैसा व्यवहार करने लगी। आलोक के साथ भी आख़िर वही हुआ, जो दुनिया की सौतेली माँ प्रायः अपने सौतेले बच्चों के साथ करती है। बेचारा आलोक दिनभर काम करता और खाली समय में हनुमान जी की प्रतिमा के सामने बैठकर अपनी पुस्तकों का अध्ययन करता था। आलोक आशावादी बालक था, इसलिए उसने आस नही छोड़ी। उसकी प्रतिज्ञा थी कि वह खूब पढ़ेगा और बड़ा आदमी बनेगा। भगवान पर विश्वास करता हुआ वह आगे बढ़ता चला गया।

         इधर चंद्रमुखी का अत्याचार भी और अधिक बढ़ता गया। एक दिन ऐसा भी आया, जब उसने अलोक को घर से बाहर निकाल दिया। आलोक के पिता इन बातों से अनभिज्ञ अपने ब्यापार में लगे रहे। आलोक घर से जाते समय हनुमान जी की प्रतिमा और अपनी माँ का दिया गले का ताबीज़ (जो उसकी माँ ने मरते वक्त पहचान के रूप में दिया था) साथ में ले गया। आलोक दिनभर भटकता रहा। शाम को वह एक बगीचे में बैठकर रो रहा था, उसी वक्त बगीचे का माली दयाशंकर वहाँ आया और उससे रोने का कारण पूछा। आलोक ने सारा हाल उसे बता दिया। माली काका ने कहा -“बेटा! मैं तुम्हें पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाऊंगा, तुम मेरे साथ चलो।“ ऐसा बोलकर वह अपने साथ उसे ले गया। 

माली काका का अपना कोई पुत्र नही था, इसलिए उन्होंने आलोक को अपना बेटा बना लिया और उसकी पत्नी भी आलोक को पाकर बहुत खुश थी। अब आलोक अपनी पढाई करता और खाली समय में माली काका और उनकी पत्नी की सेवा करता। देखते-देखते आलोक 20 वर्ष का हो गया। वह मेहनत करके 5 साल बाद डॉक्टर बन गया। डॉक्टर आलोक ने माली बाबा के नाम से एक नर्सिंग होम खुलवाया और उसका नाम ‘दयाशंकर नर्सिंग होम’ रखा।

          एक बार की बात है। चंद्रमुखी की तबियत बहुत ख़़राब हो गई। उसका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। उसे बहुत से डॉक्टरों को दिखाया गया, किन्तु कोई सुधार नहीं हुआ। सेठ धनीराम को डर था कि कहीं चंद्रमुखी भी उसे छोड़कर चली न जाए। सेठ दुःखी था कि उसके नसीब में परिवार का सुख ही नहीं है। बेटे के जाने की चिंता तो उसे अंदर ही अंदर खा ही रही थी, अब पत्नी के स्वास्थ्य की भी चिंता उसे सता रही थी, जिसका इलाज करा कर वह थक गया था। कुछ लोगों ने उसे बताया कि वह दयाशंकर नर्सिंग होम में चंद्रमुखी को दिखाए, तो वह ठीक हो जाएगी। 

सेठ धनीराम अपनी पत्नी को लेकर नर्सिग होम गया, वहाँ बहुत भीड़ थी। सेठ बहुत परेशान था। किसी तरह से डॉक्टर से मिला, तथा उसने उन्हें चंद्रमुखी की परेशानियों को बताया। उसका इलाज शुरू हो गया, चंद्रमुखी धीरे-धीरे ठीक होने लगी।

          एक बार धनीराम अकेले में बैठा अपने पुत्र आलोक के बारे में सोच रहा था क्योंकि डॉक्टर साहब में उसे अलोक की छवि नज़र आती थी। आखिर आलोक उसका अपना खून था। यही सोच रहा था, तभी डॉक्टर आया और सेठ से बोला - “बाबा! आप चिंता मत करो। आपकी पत्नी अब बिल्कुल सही है।“ यह कह कर वह चंद्रमुखी की जाँच करने लगा। तभी धनीराम ने आलोक के गले में ताबीज को देखा और मन ही मन सोचने लगा कि यही मेरा आलोक है। इतने में डॉक्टर ने कहा कि बाबा! आप अब इनको घर ले जा सकते है। 

आलोक के मुँह से ‘बाबा’ शब्द सुनकर सेठ भावुक हो गया और फिर अपने बेटे को गले से लगा कर रोने लगा। इतने में चंद्रमुखी भी आलोक को गले से लगा कर रोने लगी और माफ़ी मांगने लगी। आलोक तो सबको पहचान ही रहा था, लेकिन उसका अतीत उसके वर्तमान को प्रभावित न करे, ऐसा प्रयत्न भी कर रहा था। किन्तु फिर भी पिता का स्पर्श पाकर उसे एक सुखद अनुभूति हुई और वह भी रोने लगा। आलोक अपने माता-पिता को माली बाबा के पास ले गया और उनका परिचय कराया। यह देख माली व उनकी पत्नी की आँखों में भी आंसू आ गए।

          इधर आलोक ख़ुशी से झूम उठा कि उसका बचपन में छूटा हुआ परिवार उसे मिल गया। अब आलोक अपने दोनों परिवारों के साथ आनंद के साथ रहने लगा।                                                                    - शिल्पी पाण्डेय ( लखनऊ)

इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है कि जब परिस्थितियाँ बुरी से बुरी दिखाई दें, तो भी उनसे भागो मत या उनके विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार न हो जाओ। तुम कभी नहीं जान पाओगे कि तुम जीत के इतने निकट हो और अगले झोंके में ही सफल हो सकते हो।

यह कहावत -‘आपकी असफलता में ही आपकी सफलता का राज़ छिपा हुआ है’ (In your failure lies the secret of your success.) बहुत सोच-विचार कर लिखी गई है। सफलता/असफलता, ख़ुशी/गम, रात/दिन इत्यादि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए प्रकृति के नियमों के द्वारा जहां एक होगा, वहां दूसरा होने के लिए प्रतिबद्ध (bound) होगा। इसके लिए बेचैन (upset) होने की आवश्यकता नहीं है।

प्रेषिका- सरिता जैन 

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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