‘ Learn to say ‘No’.

 ‘न’ कहना सीखो।

 Learn to say ‘No’. 


अपने लक्ष्य की ओर देखो, साहसी बनो और कभी भी कहीं भी जब परिस्थिति का तकाज़ा हो, ‘न’ कहने से हिचकिचाओ नहीं। ‘न’ कहने का हल्का-सा साहस कभी-कभी सारे जीवन को परेशानी से को बचा सकता है। दूसरों के प्रभाव से अपने जीवन का संचालन न करो।अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाओ। यदि तुम ठीक हो, तो तीव्र विरोध होने पर भी चट्टान की तरह अडिग रहो। किसी भी अन्याय या ग़लती होने के विरोध में अपनीआवाज़ उठाने का साहस भी रखो। 

सहयोग करने की भी एक सीमा होती है।

कार्यालय से घर लौटते समय शाम का ट्रैफ़िक अपने चरम पर था। थकी-हारी शालिनी बस घर पहुँचकर आराम करना चाहती थी। तभी उसकी नज़र सड़क किनारे खड़े अपने पुराने सहकर्मी, रमेश पर पड़ी। रमेश हाथ हिलाकर उसे बुला रहा था। शालिनी ने एक पल सोचा कि अनदेखा करके निकल जाए, लेकिन रमेश की मदद मांगने वाली आँखों ने उसे रोक लिया।

रमेश ने पास आते ही कहा, “शालिनी! मेरी बाइक खराब हो गई है और मुझे तुरंत अपने बीमार पिताजी के पास अस्पताल पहुँचना है। क्या तुम मुझे थोड़ी लिफ्ट दे सकती हो? रास्ता थोड़ा लंबा है, तुम्हारे घर के रास्ते में भी नहीं पड़ेगा, पर इमरजेंसी है।“

शालिनी जानती थी कि अस्पताल का उसके घर से विपरीत दिशा में कम से कम एक घंटे का रास्ता था। ऐसे तो वह अपने घर जाने में दो घण्टे लेट हो जाएगी। वह खुद भी बहुत थकी हुई थी। पिछले कुछ महीनों से, वह हमेशा दूसरों की मदद के लिए ’हाँ’ कहती आई थी, भले ही इसका मतलब खुद के लिए परेशानी उठाना हो। इस ’हाँ’ कहने की आदत ने उसे शारीरिक और मानसिक रूप से थका दिया था।

एक पल के लिए उसने सोचा कि अब से वह कह देगी कि उसे कोई ज़रूरी काम है या वह भी किसी और के साथ है, क्योंकि उसे याद आया कि कैसे उसकी इस आदत का फ़ायदा अक्सर लोग उठाने लगे थे।

उसने गहरी साँस ली और सोचा कि यह मुझसे ही मदद क्यों मांग रहा है? स्वयं ऑटो करके भी तो अस्पताल जा सकता है। क्या इसे मालूम नहीं है कि मैं भी तो अभी ऑफिस से आ रही हूँ। मुझे भी और काम हो सकते हैं। 

उसने धीरे से, लेकिन दृढ़ता से कहा, “माफ़ करना, रमेश! मैं तुम्हें लिफ्ट नहीं दे पाऊँगी। मैं बहुत थकी हुई हूँ और मुझे भी घर पहुँचकर कुछ ज़रूरी काम निपटाने हैं। तुम यहाँ से ऑटो ले लो, ज़्यादा जल्दी पहुँच जाओगे।“

रमेश थोड़ा निराश हुआ, लेकिन शालिनी अपने निर्णय पर अडिग रही। उसने हाथ जोड़कर रमेश से माफ़ी मांगी और अपनी स्कूटी आगे बढ़ा दी।

उस शाम घर पहुँचकर, भले ही उसे थोड़ा अपराध बोध हुआ, लेकिन साथ ही एक अजीब सी शांति और खुद पर नियंत्रण का अहसास भी हुआ। उसने महसूस किया कि हर बार दूसरों की उम्मीदों पर ख़रा उतरने के लिए अपनी ज़रूरतों और सीमाओं को नज़रअंदाज़ करना ज़रूरी नहीं है।

सीख - अपनी सीमाओं को पहचानना और ज़रूरत पड़ने पर विनम्रतापूर्वक ’न’ कहना, आत्म-सम्मान और मानसिक शांति के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना कि दूसरों की मदद करना। 

यदि तुम महान और अद्वितीय बनना चाहते हो, तो तुम्हें बाकी भीड़ से अलग बनना होगा। जो भी हो, तुम्हें केवल अपने लक्ष्य की ओर देखना है। किसी असमंजस में नहीं पड़ना है। आदरपूर्वक विनम्र रहकर भी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना संभव हो सकता है। यदि संभव हो और आवश्यकता हो, तो दूसरों को ‘न’ कहने का कारण भी बता सकते हो। इससे तुम स्वयं कष्ट उठा कर सब की मदद करने की अपनी आदत का नाजायज फ़ायदा लोगों को नहीं उठाने दोगे।

प्रेषिका- सरिता जैन 

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 


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