Avoid making advice to others

  जब तक पूछा न जाय तब तक दूसरों की आलोचना करने व टिप्पणी या नसीहत देने से बचो। 
Avoid making remarks / comments / advice to others unless asked.

जीवन में केवल अपनी उन्नति की ओर ध्यान दो। दूसरे क्या कर रहे हैं इस विषय में चिन्ता करने या दख़ल देने में समय को नष्ट न करो।

दूसरों के कामों के बारे में आलोचना, टिप्पणी और उन के दोष ढूँढने से बचो। कुछ लोगों को हरेक को अनावश्यक सलाह देने की आदत होती है, चाहे पूछी गई हो या नहीं। यहाँ भी तुम्हें केवल पूछने पर ही नसीहत देनी चाहिए और यदि तुम मामले से परिचित नहीं हो तो ग़लत और अस्पष्ट नसीहत देने की बजाय क्षमा मांग लेनी चाहिए। इसी प्रकार कोई शिक्षा जो तुम दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिए देना चाहते हो, उसे शब्दों से देने के स्थान पर अपने व्यवहार से दो। तब उसका अधिक प्रभाव होगा। यह भी याद रखो कि तुम किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के बिना नहीं मोड़ सकते।

बिना मांगे नसीहत न दो (Don't give advice without being asked) विषय पर एक लघुकथा यहाँ दी गई है, जो बताती है कि कैसे अनावश्यक सलाह देना अक्सर उल्टा पड़ जाता है, और सच्ची समझदारी तब दिखती है जब हम दूसरों की ज़रूरत और समझ के अनुसार कार्य करते हैं, जैसे कि एक समझदार दोस्त या परिवार के सदस्य की तरह, न कि किसी उपदेशक की तरह। 

’चुपचाप’ - एक सीख

रमेश एक मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था, लेकिन आजकल वह कुछ परेशान था। उसकी छोटी सी दुकान पर ग्राहक कम आने लगे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे।

उसके पड़ोसी सुरेश, एक ज्ञानी और अनुभवी व्यक्ति होने का दिखावा करते थे। हर बात पर उनकी लंबी-लंबी नसीहतें शुरू हो जातीं। जब भी रमेश थोड़ा उदास दिखता, सुरेश आकर कहते, “रमेश भाई, आजकल बाजार बहुत बदल गया है। तुम्हें अपनी दुकान का रंग-रूप बदलना चाहिए, नए ऑफर देने चाहिए, और...“ उनकी बातें सुनकर रमेश का सिर भारी हो जाता, पर वह चुपचाप सुनता रहता।

एक दिन, रमेश ने हिम्मत करके सुरेश से पूछा, “भाई साहब, मैं बहुत परेशान हूँ, क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं?“

सुरेश तुरंत बोले, “अरे! मैंने तुम्हें कब कहा था कि इतनी बड़ी दुकान खोलो? तुम्हें तो छोटे स्तर पर काम करना चाहिए था। अब देखो, मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम्हें क्या करना चाहिए...“ और फिर से नसीहतों का सिलसिला शुरू हो गया।

रमेश को लगा कि जैसे उसके अंदर से कुछ टूट रहा है। वह समझ गया कि सुरेश को सलाह देने में मज़ा आता है, मदद करने में नहीं।

अगले दिन, रमेश ने सुरेश की सलाहों को सुनना बंद कर दिया। जब सुरेश ने फिर से कुछ कहना चाहा, तो रमेश ने मुस्कुराकर कहा, “भाई साहब, आपकी बातें सुनकर अच्छा लगा, लेकिन मुझे लगता है कि अभी मुझे खुद कुछ करने की ज़रूरत है। शायद आपकी बातों से ज़्यादा, मुझे बस एक खामोश साथी की ज़रूरत है।“

सुरेश थोड़ा झेंप गए। रमेश ने आगे कहा, “आप मेरी दुकान पर आइए, कुछ खा-पी लीजिए, बस। मुझे आज सिर्फ़ एक दोस्त चाहिए, उपदेशक नहीं।“

सुरेश को अपनी ग़लती का एहसास हुआ। उन्होंने सिर झुकाया और बोले, “माफ़ करना, रमेश। मैं भूल गया था कि कभी-कभी चुप रहकर सुनना, बिना कहे सब कुछ कह जाता है।“

उस दिन के बाद, सुरेश ने रमेश को सलाह देना बंद कर दिया और सिर्फ़ एक दोस्त बनकर उसकी दुकान पर बैठने लगे। और अजीब बात, रमेश को अकेलापन कम लगने लगा और उसने अपनी सूझबूझ से धीरे-धीरे अपनी दुकान को फिर से पटरी पर लाना शुरू कर दिया।

नैतिक शिक्षा - हर किसी को बिना मांगे सलाह देने से बेहतर है कि हम उनकी स्थिति समझें और सिर्फ़ एक सच्चे साथी की तरह उनका साथ दें। चुप रहकर सुनना भी एक बहुत बड़ी मदद हो सकती है

यदि तुम प्रबंधक के पद पर हो और तुम्हें अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से काम लेना होता है तो तुम्हें उनके बारे में टिप्पणी, आलोचना और नसीहत देना आवश्यक हो जाता है। लेकिन अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए यह आलोचना सलाह की भावना से होनी चाहिए और अभिमान तथा शासन करने की भावना से युक्त नहीं होनी चाहिए।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

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