You are not indispensable for the world
तुम स्वयं को दुनिया के लिए अत्यावश्यक न मानो।You are not indispensable for the world
कृपया नोट करें कि तुम्हारे या मेरे बिना यह दुनिया न रुकती है, न चलती है। यह तब भी चलती थी, जब हम यहां नहीं थे, यह तब भी चलेगी, जब हम यहां नहीं होंगे। हम तो यहां केवल कुछ समय के लिए, शिक्षा के इस बड़े स्कूल से कुछ पाठ सीखने और द्रेनिंग लेने के लिए अस्तित्व में आए हैं, दुनिया हमसे कुछ नहीं चाहती। यह आत्म-निर्भर है।
केवल हम ही अपनी वृद्धि और सुरक्षा के लिए दुनिया का उपयोग कर रहे हैं। कुछ बड़ा काम करके तुम वास्तव में अपनी ही मदद कर रहे हो, दुनिया की नहीं।
तुम्हारे बिना भी दुनिया चलती रहेगी - शीर्षक पर आधारित एक मौलिक लघुकथा निम्नलिखित हैः
भ्रम का अंत
रामदीन को लगता था कि इस दफ्तर का हर कागज उसकी उंगलियों के इशारे पर नाचता है। वह पिछले तीस सालों से इसी कुर्सी पर बैठा था। रिटायरमेंट के करीब आते ही उसके भीतर एक अजीब-सी अकड़ आ गई थी। वह अक्सर कहता, “मेरे बाद इस विभाग का क्या होगा? फाइलें धूल फांकेंगी, काम रुक जाएगा। आखिर अनुभव भी तो कोई चीज होती है!“
उसने अपने जूनियर, समीर, को कभी ढंग से काम नहीं सिखाया। उसे डर था कि समीर सब सीख गया तो रामदीन की अहमियत कम हो जाएगी। अपनी विदाई पार्टी में भी रामदीन ने भारी मन से कहा, “काम संभाल लेना, समीर! वैसे मुश्किल तो बहुत होगा मेरे बिना...“
रिटायरमेंट के ठीक एक हफ्ते बाद, रामदीन अपनी ’जरूरी’ छड़ी भूल जाने के बहाने दफ्तर गया। उसे लगा था कि वहां कोहराम मचा होगा, लोग उसे ढूंढ रहे होंगे। लेकिन वहां का नजारा कुछ और ही था।
समीर अपनी मेज पर बैठा शांति से काम कर रहा था। फाइलों का अंबार गायब था। मेज पर कंप्यूटर के साथ-साथ कुछ नए सॉफ्टवेयर भी आ गए थे, जिनसे काम और भी तेज हो रहा था। चपरासी ने चाय का प्याला रामदीन के सामने रखते हुए कहा, “साहब, अब तो काम बहुत आराम से हो जाता है। समीर साहब ने सारा सिस्टम डिजिटल कर दिया है।“
रामदीन अपनी कुर्सी की ओर बढ़ा, जिसे अब समीर ने अपनी जरूरत के हिसाब से सेट कर लिया था। वहां अब रामदीन की पुरानी फाइलों की गंध नहीं, बल्कि ताजी कॉफी और नएपन की महक थी। जिस दफ्तर को वह अपना साम्राज्य समझता था, वह उसके बिना और भी बेहतर चल रहा था।
सीढ़ियां उतरते हुए रामदीन को एहसास हुआ कि अपरिहार्यता केवल एक भ्रम है। सूरज कल भी उगेगा, नदियाँ कल भी बहेंगी और इंसान रहें न रहें, दुनिया अपना रास्ता खुद खोज लेती है।
सीखः
सच्चाई यही है कि कोई भी व्यक्ति अपरिहार्य नहीं है। दुनिया किसी के लिए नहीं रुकती, वह परिवर्तन के साथ आगे बढ़ती रहती है।
अतः अपनी उत्तेजनाओं और चिन्ताओं को दूर करो कि जब तुम नहीं होंगे तो क्या होगा और न ही घमंड करो कि यह सब तुम्हारे कारण ही चल रहा है। इसी प्रकार तुम्हारे परिवार के पालन पोषण के बारे में अनावश्यक उत्तेजनाएं और चिन्ताएं भी तुम्हें नहीं होनी चाहिए।
वह तुम्हारे द्वारा नहीं बल्कि भगवान द्वारा पालित पोषित हो रहा है। तुम केवल बीच में एक दर्शनीय वस्तु (show piece) हो।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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