Remain above diseases of the body.
शारीरिक बीमारियों से ऊपर उठो। Remain above diseases of the body.
शरीर एक भौतिक मशीन है और हर प्रकार के होने वाले दुःख, दर्द और बीमारियां इस पर निर्भर हैं कि तुम इसकी कितनी देखभाल करते हो तथा कुछ अन्य कारणों पर भी इसके दुःख, दर्द और बीमारियां निर्भर हैं।
हम दर्द को सहन करने के लिए या दर्द को समाप्त करने के लिए मानसिक शक्ति का भी प्रयोग कर सकते हैं, क्योंकि शरीर मन के सीधे नियंत्रण में है। हम दर्द के अनुभव को मन को शरीर से अलग करके दूर कर सकते हैं और उसे किसी अन्य तटस्थ वस्तु पर केन्द्रित कर सकते हैं जैसे श्वसन क्रिया पर, किसी मंत्र पर या किसी प्रत्यक्ष वस्तु पर; जैसा ध्यान की अवस्था में किया जाता है। हम अन्तर्मन में (आँख बंद करके) उस दर्द वाले स्थान पर ध्यान केन्द्रित करके और वहां प्राणों के बहाव को अधिक करके भी दर्द को कम कर सकते हैं। अन्तर्मन को समझाने और उस स्थान पर दृष्टिपात करने के साथ-साथ दर्द वाले स्थान पर मानसिक रूप से ध्यान लगाकर यह प्रभाव बढ़ाया जा सकता है।
मन की शक्ति
एक शहर में माधव नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह अपनी सेहत को लेकर बहुत जागरूक था, शायद जरूरत से ज्यादा। वह अक्सर छोटी-छोटी शारीरिक परेशानियों (जैसे हल्का सिरदर्द या पेट में मरोड़) को लेकर बहुत चिंतित हो जाता था। वह अक्सर डॉक्टरों के पास जाता और नई-नई बीमारियों के बारे में पढ़ता रहता था। इस “वहम की बीमारी“ के कारण, वह लगभग हमेशा अस्वस्थ महसूस करता था, भले ही उसकी रिपोर्ट नॉर्मल आती हो।
उसी के पास वाले पार्क में एक वृद्ध व्यक्ति, वैद्यजी, रहते थे। एक दिन, माधव परेशान होकर वैद्यजी के पास गया और कहा, “वैद्यजी, मैं स्वस्थ रहना चाहता हूँ, लेकिन शरीर में हमेशा कोई न कोई बीमारी बनी ही रहती है। मैं क्या करूँ?“
वैद्यजी मुस्कुराए और कहा, “माधव, तुम्हारा शरीर बीमार नहीं है, तुम्हारा ’मन’ बीमार है। तुम शरीर से बहुत ज्यादा मोह करते हो और उसे ही ’मैं’ मानते हो। जिस दिन तुम शरीर की सीमाओं से ऊपर उठकर आत्मा की शक्ति को पहचानोगे, उस दिन तुम्हारी बीमारियाँ ठीक हो जाएँगी।“
माधव ने कहा, “यह कैसे संभव है?“
वैद्यजी ने उसे एक कहानी सुनाईः “एक बार एक बहुत ही ज्ञानी महात्मा एक गाँव से गुजर रहे थे। उन्हें एक मजदूर मिला, जो बहुत बीमार और कमजोर दिख रहा था, लेकिन वह बड़ी लगन से पत्थरों को तराश कर मंदिर बना रहा था। महात्मा जी ने पूछा, ’तुम बीमार हो, फिर भी इतना परिश्रम क्यों कर रहे हो?’ मजदूर ने कहा, ’महाराज, मेरे शरीर में दर्द हो सकता है, लेकिन मेरा मन यहाँ जो मंदिर बन रहा है, उसमें लगा है। यह खुशी मुझे दर्द से ऊपर उठा देती है।’ वैद्यजी ने आगे कहा, “तुम्हारा भी यही हाल है। जब तुम खुद को ’शरीर’ मान लेते हो, तो दर्द महसूस होता है। जब तुम खुद को ’मन’ या ’आत्मा’ मानते हो और किसी ऊंचे उद्देश्य (अपने काम, खुशी, या दूसरों की सेवा) में खुद को भूल जाते हो, तो बीमारियाँ तुम्हें लाचार नहीं कर पातीं। शरीर में बीमारी हो सकती है, लेकिन तुम उस बीमारी से ऊपर उठ सकते हो।“
माधव को सीख समझ आ गई। उसने अपनी छोटी-मोटी तकलीफों पर ध्यान देना कम कर दिया। उसने आलस्य त्यागा, काम करना शुरू किया और अपने मन को रचनात्मक कार्यों में व्यस्त कर लिया। जल्द ही, उसने महसूस किया कि वह पहले से बहुत अधिक चुस्त और ख़ुश रहने लगा है। उसे समझ आ गया था कि असली निरोगी जीवन शारीरिक मेहनत और शांत मन में निहित है।
सीखः
शारीरिक बीमारियाँ अक्सर हमारे मन के डर और चिंता से उत्पन्न होती हैं। जब हम दृढ़ इच्छाशक्ति से मन को शरीर से ऊपर उठाते हैं, तो कोई भी बीमारी हमें लाचार नहीं बना सकती। शरीर से नहीं, मन से स्वस्थ रहें।
दर्द को सहन करने के भौतिक उपायों में उपचार की प्राकृतिक चिकित्सा को प्राथमिकता देनी चाहिए। प्राकृतिक उपचार-चिकित्सा में जल से उपचार, योग, व्रत, मिट्टी-चिकित्सा, मालिश, एक्यूप्रैशर, हीलोथैरेपी, भोजन-चिकित्सा, वर्ण-चिकित्सा आदि हैं। एलोपैथिक दवाइयां केवल विशेष संकट की स्थिति में ही लेनी चाहिए, स्थाई उपचार के लिए नहीं।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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