त्याग की बात
त्याग की बात
एक छोटे से कस्बे में श्री प्रकाश अपनी मां सावित्री देवी और पत्नी अंजली के साथ रहते थे। घर सादा था पर प्यार की कमी नहीं थी। मगर एक बात थी मां और बहू का रिश्ता हमेशा थोड़ा खिंचा-खिंचा रहता था। कभी रसोई की बात पर तकरार तो कभी बातों बातों में ताने। श्री प्रकाश बीच में पड़ते तो दोनों चुप हो जातीं लेकिन उनके दिलों की दीवारें जस की तस रहतीं।
एक दिन शाम को तीनों घर के आँगन में बैठे थे। हवा में हल्की ठंडक थी, पर माहौल भारी था। तभी सावित्री देवी ने चुप्पी तोड़ी और कहा - बेटा! एक बात पूछूँ?
जी, मां! पूछिए।
कल्पना करो कि हम और तुम्हारी बीवी दोनों गंगा जी नहाने जाएँ और अचानक हमारा पैर फिसल जाए। हम दोनों डूबने लगें तो तू किसे बचाएगा? अपनी मां को या अपनी बीवी को?
प्रकाश का चेहरा उतर गया। सवाल सीधा था, जवाब मुश्किल था। एक तरफ जन्म देने वाली मां दूसरी तरफ जीवन संगिनी। दोनों में से किसी को चुनना मतलब किसी का दिल तोड़ना।
आँगन में सन्नाटा छा गया। तभी अंजली ने धीरे से कहा - हे पति देव!
आप अपना धर्म श्रवण कुमार की तरह निभाना।
डूबती हुई मां और बीवी में से अपनी मां को ही बचाना।
मां की ममता को मत लजाना।
हमारा क्या है हम तो जवान हैं, मौत से भी जूझ लेंगे।
और हमें बचाने तो जिन्हें तैरना नहीं आता, वे भी कूद पड़ेंगे।
सावित्री देवी की आंखें भर आईं। उन्होंने अंजली का हाथ थाम लिया।
बिटिया, तूने तो मेरा हृदय जीत लिया। जो बहू अपनी सास के लिए त्याग की बात करे, वह घर की लक्ष्मी होती है। प्रकाश ने सिर झुका लिया। उसके मन में गर्व और भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया। मां और बहू के बीच जो दीवार थी वो जैसे गंगा में बह गई।
अब घर में रोज हंसी गूंजती, रसोई से स्वादिष्ट खुशबू आती, और सावित्री देवी अक्सर कहतीं - जिस बहू के दिल में इतनी समझदारी हो, वह ही सच्चे अर्थों में घर की गंगा है। और श्री प्रकाश सोचते - कभी कभी एक कल्पना ही रिश्तों को नया जन्म दे देती है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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