Avoid the strain

 

 दूसरों को प्रभावित कर पाने के तनाव को छोड़ दो।
 Avoid the strain of impressing others.


आधुनिक समाज में एक आदमी के लिए तनाव के बड़े स्रोतों में से एक यह है कि वह दूसरों की नज़रों में हमेशा ऊँचा उठना चाहता है। जब कि असल में किसी को पता नहीं होता कि वह उस स्तर पर है भी या नहीं। हम दूसरों के द्वारा नापसंद हो कर नहीं रह सकते। दूसरों की राय का डर सबसे बड़ी धमकी है, जो आधुनिक मनुष्य ने अपने लिए बना ली है। हम इस भयंकर तनाव को पहचानने में असफल हो जाते हैं जो अपने ऊपर दूसरों की दृष्टि में ऊँचा उठने के लिए डाल रहे हैं।

दूसरों को प्रभावित करने और उससे आनन्द प्राप्त करने की कोशिश में तुम अप्रत्यक्ष रूप से अपनी ख़ुशी की चाबी दूसरे को थमा रहे हो, अर्थात् यदि वे चाहें तो तुम्हें ख़ुश कर देंगे और यदि वे चाहें तो तुम्हारे जीवन को दुःखमय बना देंगे। तुम केवल दूसरों के हाथों की कठपुतली बन जाओगे, जो अपनी पसंद की धुन पर तुम्हें नचाएंगे। अन्य शब्दों में दूसरों की दया पर अपनी ख़ुशी को गिरवी रख कर तुम एक दास या भिखारी के स्तर तक अपने आप को नीचा गिरा दोगे।

तुम्हारी ख़ुशी और सन्तोष तुम्हारे अन्दर रहना चाहिए और किसी को भी इसे तुम से छीनने का हक नहीं होना चाहिए। तुम्हें कोई भी काम अपनी सन्तुष्टि के दृष्टिकोण की प्राथमिकता पर करना चाहिए। जो भी तुम कर रहे हो उससे तुम्हारे अन्दर ख़ुशी पैदा होनी चाहिए। तुम्हारी ख़ुशी को उस समय की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए जब कोई आएगा और तुम्हारे काम की प्रशंसा करेगा।

मुखौटा और बोझ

एक गाँव में 'सुमित' नाम का एक युवक रहता था। वह अपनी हर चीज़ को लेकर बहुत सचेत रहता था—उसके कपड़े, उसकी बात करने का तरीका और यहाँ तक कि उसके घर का फर्नीचर भी। उसे हमेशा यह डर सताता रहता था कि "लोग क्या कहेंगे?" या "क्या वे मुझसे प्रभावित होंगे?"

इस तनाव में वह हमेशा थका-थका और चिड़चिड़ा रहने लगा। Medanta के अनुसार, ऐसा मानसिक तनाव हमारे शरीर में कोर्टिसोल का स्तर बढ़ा देता है जिससे चिड़चिड़ापन और नींद की कमी होने लगती है। 

एक दिन वह पहाड़ पर रहने वाले एक संत के पास गया और बोला, "महाराज, मैं हर किसी को खुश और प्रभावित करना चाहता हूँ, लेकिन इस कोशिश में खुद को खोता जा रहा हूँ। मैं क्या करूँ?"

संत ने उसे एक भारी पत्थर उठाने को कहा और कहा, "इसे पकड़कर मेरे पीछे चलो।" सुमित पत्थर लेकर चलने लगा। कुछ देर बाद उसके हाथ काँपने लगे और कंधे दुखने लगे।

उसने कराहते हुए कहा, "महाराज, यह बहुत भारी है, मैं अब और नहीं ढो सकता!"

संत मुस्कुराए और बोले, "यही तुम्हारे जीवन की सच्चाई है। दूसरों को प्रभावित करने की इच्छा उस पत्थर की तरह है। जितना लंबा इसे ढोओगे, दर्द उतना ही बढ़ेगा। जैसे ही तुम इसे नीचे रख दोगे, तुम हल्का महसूस करोगे।"

सीख:

दूसरों की राय को नियंत्रित करना हमारे हाथ में नहीं है। जब आप दूसरों को नियंत्रित करने या प्रभावित करने की कोशिश छोड़ देते हैं, तो आप वास्तव में स्वतंत्र और शांत हो जाते हैं। असली प्रभाव सादगी और खुद के प्रति सच्चे रहने से पड़ता है, न कि दिखावे के बोझ से।

अन्य व्यक्तियों को अधिक महत्त्व मत दो, चाहे वे तुम्हारे चरित्र-बल (calibre) या योग्यता को जानते हों या नहीं या वे आपका अति मूल्यांकन करते हों या अल्प मूल्यांकन करते हों (over estimate or under estimate)। इस दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो तुम्हारे बारे में बिल्कुल नहीं जानते। क्या इससे तुम्हें कोई अन्तर पड़ता है? तुम्हारा अपने निर्णय के अनुसार अपना आकलन अधिक महत्त्वपूर्ण है। अन्य व्यक्तियों द्वारा की गई आलोचनाएं केवल एक ऐसे अवसर के रूप में ही स्वीकार करनी चाहिएं, जिससे तुम अपना पुनः निरीक्षण कर सको और यदि आवश्यकता हो तो उसे सही करने का उपाय कर सको। यहां तक कि यदि तुम किसी क्षेत्र में कमज़ोर हो तो इसे अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। 

इस विभिन्न प्रकार की दुनिया में लोगों में अन्तर होना स्वाभाविक है, इसमें कुछ भी असाधारण नहीं है। कुछ क्षेत्रों में तुम अच्छे हो सकते हैं और कुछ क्षेत्रों में अन्य बहुत अच्छे हो सकते हैं। यह इच्छा करना कि इस दुनिया में सभी क्षेत्रों में तुम्हें ऊपर रहना चाहिए और लोग इस दुनिया में केवल तुम्हारी ही प्रशंसा करें, यह उच्च स्तर का छलावा है।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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