Don’t have expectations
अपने जीवनसाथी (पति या पत्नी) से सामान्य से अधिक
आशाएं न रखो।
Don’t have supernormal expectations from your spouse.
तुम्हारा जीवनसाथी भी अन्य सामान्य व्यक्ति के समान ही है।
जैसी कमज़ोरियाँ और मज़बूती किसी भी सामान्य व्यक्ति में होती हैं, वैसी ही उसमें भी हैं। उसे एक विशेष और आदर्श व्यक्ति मान कर उससे दोष रहित व्यवहार की उम्मीद मत रखो। ऐसा करना तो सपनों की दुनिया में रहने जैसा है। अन्य लोगों की तरह वह भी कई मूर्खतापूर्ण काम करेगा और मूर्खतापूर्ण आदतों (funny habits) का शिकार होगा। वास्तव में तुम्हें पहले ही ऐसी आदतों को स्वीकार कर लेना चाहिए। तुम्हारी योग्यता इसी में है कि जो गुण और सामर्थ्य उनमें हैं उनसे ही अच्छे से अच्छा प्राप्त किया जाए।
तुम्हें उनके स्वभाव की बुरी आदतों और दुःख पहुंचाने वाले कामों से समझौता करना, सहना, समायोजन करना या यहाँ तक कि भूलना भी सीखना चाहिए। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। प्रत्येक में कुछ असामान्य और अनोखी विशेषताएं होती हैं जो उन्हें औरों से अलग करती हैं। तुम्हें यह प्रयत्न करना चाहिए कि उन परिस्थितियों को न पैदा किया जाए या न बनाया जाए जो तुम्हारे साथी के क्रोध को जागृत करें।
उम्मीदों का बोझ
अमन और कविता की शादी को पाँच साल हो चुके थे। अमन एक कॉर्पोरेट कंपनी में काम करता था, जहाँ काम का बहुत दबाव था। कविता एक गृहिणी थी और हमेशा चाहती थी कि अमन घर आते ही सबसे पहले उसकी और घर की बातों पर ध्यान दे।
कविता अक्सर शिकायत करती, "तुम्हें मेरे लिए वक्त ही नहीं है। न मैं शॉपिंग पर जा पाती हूँ, न हम साथ समय बिताते हैं।" अमन थक-हारकर आता और जब यह सब सुनता तो चिढ़ जाता। वह कहता, "कविता, मैं इतना काम सिर्फ हमारे भविष्य के लिए कर रहा हूँ। मैं भी थक जाता हूँ, तुम क्यों नहीं समझतीं?"
कविता को लगता कि पति है तो उसे पत्नी की हर इच्छा पूरी करनी चाहिए, जबकि अमन को लगता कि पत्नी को उसकी थकान समझनी चाहिए। उम्मीदें बढ़ती गईं और उनके बीच दूरियां भी।
एक दिन, उनके एक पारिवारिक मित्र, विकास, जो बहुत खुशहाल वैवाहिक जीवन जी रहे थे, उनके घर आए। उन्होंने कविता और अमन के बीच का तनाव भांप लिया।
विकास ने धीरे से कविता से कहा, "कविता, जीवनसाथी से अपनी भावनात्मक सुरक्षा की उम्मीद रखना गलत नहीं है, लेकिन उन्हें 'पूर्ण' (perfect) मानने की उम्मीद रखना गलत है। वे इंसान हैं, मशीन नहीं। जब तुम उनसे बहुत ज्यादा आशा करती हो, तो तुम उनके कंधों पर उम्मीदों का बोझ डाल देती हो। उस बोझ से रिश्ते दबने लगते हैं।"
अमन से उन्होंने कहा, "और अमन, थोड़ा समय अपनी पत्नी को भी दो, वरना रिश्ते की नींव कमजोर हो जाएगी।"
कविता को बात समझ आ गई। उसने अमन से हर समय उपलब्ध रहने की उम्मीद छोड़ दी, और अमन ने भी अपनी व्यस्तता के बीच से कविता के लिए समय निकालना शुरू किया।
सीख:
दांपत्य जीवन में सुख और शांति के लिए ज़रूरी है कि आप अपने जीवनसाथी (spouse) से अत्यधिक आशाएं न रखें। जब आप उम्मीदें कम करते हैं, तो प्यार और सम्मान अपने आप बढ़ जाता है। खुशहाल रिश्ते की कुंजी 'अपेक्षा' नहीं, 'स्वीकार्यता' (acceptance) है।
यदि तुम अपने पति या पत्नी की किसी बुरी आदत या व्याकुल कर देने वाले व्यवहार को बदलना चाहते हो तो निंदा करने या आलोचना करने से यह कभी नहीं बदला जा सकता। यह केवल अपने आपको बदल कर और समायोजित ;ंकरनेजद्ध करके ही किया जा सकता है न कि अपने पति या पत्नी को बदलने का प्रयत्न करके। याद रखो कि जब तक कोई व्यक्ति अपने आप को बदलना न चाहे, तब तक उसे कोई नहीं बदल सकता। जो व्यवहार तुम उसके द्वारा बदलने की उम्मीद करते हो, वह केवल अपने व्यवहार के द्वारा उदाहरण दे कर दिखाओ।
तर्क द्वारा या आलोचना द्वारा किसी व्यक्ति को बदलने का मार्ग कभी नहीं हो सकता। बल्कि यह देखा गया है कि आलोचनात्मक तरीके से तो बुरी आदतें और नकारात्मक लक्षण और अधिक उग्रता से प्रतिक्रिया करते हैं। उसके अतिरिक्त तुम्हें अपने पति या पत्नी से बहुत बड़ी -बड़ी उम्मीदें व आशाएं नहीं करनी चाहिएं। तुम में से कोई भी एक
दूसरे का दास या नौकर नहीं है। दोनों को एक दूसरे के विकास में सहायक माना जाता है। दोनों अपने संबंधों में स्थिरता और आनन्द बनाए रखने के लिए बराबर की ज़िम्मेदारी में हिस्सा बांटते हैं। एक की कमज़ोरियां दूसरे की विशेषताओं के द्वारा पूरी की जानी चाहिए। यह एक आदर्श ढंग है जो इस महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध को जोड़े रखता है।
यह जुड़ाव केवल सहयोग, समझौते, समायोजन करनेजउमदजद्ध सहनशीलता और एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना से ही संभव है। यहां तक कि यदि पत्नी या पति दोनों में से एक भी समझदार और समझौतावादी नहीं है, तो हताशा और निराशा का कोई लक्षण दिखाए बिना दूसरे को अपना प्रयत्न दृढ़ विश्वास और आशा से करते रहना चाहिए। इसे किस्मत का ही एक हिस्सा मानो। अन्त में, कभी न कभी, दैवीय न्याय अपना कार्य करने के लिए बाध्य हो जाता है और परमात्मा प्रत्येक दम्पत्ति का सामंजस्य बना देता है।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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