Continue to progress

दुर्घटनाओं और दुर्भाग्यों में भी आगे बढ़ना जारी रखो।
Continue to progress even in tragedies and misfortunes


कुछ लोग ऐसे होते हैं जब उन्हें किसी दुर्घटना या अवांछित परिस्थिति का सामना करना पड़ता है तब वे अपने जीवन को पूर्णतया निष्क्रिय और नीरस बना लेते हैं। वे निराशा और हताशा से ग्रस्त हो जाते हैं, जैसे जीवन में कुछ भी शेष नहीं रहा हो। जब तक दुर्घटना का भावनात्मक प्रभाव उनके मन से नहीं जाता, तब तक वे अपना जीवन इसी दुःखदाई अवस्था में व्यतीत करते रहते हैं और इसी में उनके जीवन का सबसे मूल्यवान समय चला जाता है।

टूटे पंख और नई उड़ान

रवि एक मेधावी छात्र था, जो एथलीट बनकर देश का नाम रोशन करना चाहता था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक सड़क हादसे में उसने अपना बायां पैर खो दिया।

हादसे के बाद रवि बुरी तरह टूट गया। उसके पास 'दुर्भाग्य' को कोसने के अलावा कुछ नहीं था। वह कमरे में बंद रहता और अपने सुनहरे अतीत को याद कर रोता। उसे लगता कि अब उसकी जिंदगी खत्म हो चुकी है।

एक दिन, उसके पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग, जिन्हें लोग 'बाबा' कहते थे, रवि के पास आए। उन्होंने रवि के कमरे के बाहर लगी खिड़की की ओर इशारा किया, जहाँ एक छोटे से पौधे ने सीमेंट की दरार को फाड़कर अपनी जगह बना ली थी।

बाबा ने कहा, "बेटा, देख रहे हो? इस नन्हे पौधे के लिए वह दरार उसका दुर्भाग्य थी—उसे बढ़ने के लिए जमीन नहीं मिल रही थी। पर क्या वह रुका? नहीं! उसने उस मुश्किल से रास्ता निकाला और आज देखो, वह धूप में मुस्कुरा रहा है।"

रवि निशब्द होकर देखता रहा। बाबा की बात उसके दिल में उतर गई। उसने उस पौधे से सीखा कि परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत हो, हार मानकर बैठना ही असली दुर्भाग्य है।

रवि ने अगले ही दिन से हताशा का दामन छोड़ा। उसने बैसाखियों के सहारे चलना शुरू किया। उसने एथलेटिक्स छोड़ा, लेकिन खेल नहीं। उसने पैरा-स्पोर्ट्स में व्हीलचेयर बास्केटबॉल खेलना शुरू किया।

कुछ साल बाद, रवि न केवल एक सफल पैरा-एथलीट बना, बल्कि उसने उन बच्चों को प्रेरित करना भी शुरू किया जो शारीरिक चुनौतियों से जूझ रहे थे।

सीख: दुर्भाग्य पर आंसू बहाने से वह कभी दूर नहीं होता, बल्कि उसे स्वीकार कर जब हम आगे बढ़ते हैं, तो वही दुर्भाग्य सौभाग्य की नींव बन जाता है।

यहाँ तुम्हें यह वास्तविकता समझनी चाहिए कि दुर्घटनाएं और दुर्भाग्य प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का हिस्सा है। चाहे तुम उन्हें पसंद करो या नहीं, वे तुम्हारे भाग्य और भगवान द्वारा निश्चित किये गए तुम्हारे सारे जीवन के विधान के अनुसार तुम्हें मिलेंगी। समय-समय पर तुम पर आने वाली विपत्ति कोई असामान्य या असाधारण नहीं है।

इसलिए उनसे उद्वेलित होने के स्थान पर हमें उन्हें स्वीकार करना, सामना करना और उनका आदर करना सीखना होगा। बहुत से लोग उन्हें स्वीकार करने से मना कर देते हैं कि उनके साथ ऐसा घटित होना ही नहीं चाहिए था और वे तनावग्रस्त व मानसिक रूप से बीमार रहने लगते हैं। लेकिन जितनी जल्दी तुम स्वीकार करना सीख लोगे, उतनी ही जल्दी अपने आप को शान्त कर लोगे। तुम्हें जल्दी से जल्दी सामने आई विपरीत परिस्थिति को स्वीकारना सीखना चाहिए और सामान्य गति से कार्य आरम्भ कर देना चाहिए।

परिवर्तन जीवन की वास्तविकता है। तुम उसे कैसे रोक सकते हो। जीवन एक नदी के समान है। इसे लगातार बहते रहना है। यह जीवन के किसी एक बिन्दु पर नहीं ठहर सकती-इस सूत्र को याद रखो व स्वीकृति व समझौते के साथ दोबारा काम शुरू करो।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।  




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