Don't imagine problems

जीवन में समस्याओं और दुर्घटनाओं की कल्पना मत करो, जब वे आ जाएं तो केवल उनका सामना करो। 
Don't imagine problems and mishappening in life, just face them as they come.


कुछ लोग भविष्य में आने वाली समस्याओं की कल्पना करने में बहुत सा समय बिता देते हैं या व्यर्थ में गवां देते हैं, जैसे कहीं ऐसा या वैसा उनके जीवन में घटित न हो जाए। इस सम्बन्ध में कृपया याद रखो कि जीवन में आने वाली समस्याओं और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का, जब वे आएं, तब केवल उनका सामना किया जाना चाहिए। एक व्यक्ति को भविष्य की संभावित समस्याओं पर लगातार मन को केन्द्रित नहीं करना चाहिए। 

उदाहरण के लिए, यह मत सोचो कि ‘यदि मुझे केंसर हो गया तो क्या होगा? यदि मेरे बच्चे मुझे बुढ़ापे में अकेला छोड़ गए, तो क्या होगा? यदि मेरी नौकरी छूट गई तो क्या होगा?’ आदि।

वास्तव में तुम पाओगे कि तुम्हारी कल्पना की हुई 99ः% बातें कभी घटित नहीं होती। वे केवल तुम्हारे शंकाग्रस्त मन और व्यर्थ की कल्पनाओं की उपज हैं। जैसा पहले बताया गया है, यदि कोई दुर्घटना घट भी जाय तो तुम्हारे अंदर हमेशा उन्हें संभालने की ताकत होनी चाहिए। 

जैसे एक चिड़िया ने आम के पेड़ पर अपना घोंसला बनाया। उसमें उसके दो छोटे-छोटे बच्चे थे, जिन्हें वह रोज़ दाना लाकर खिलाती थी और उड़ना सिखाती थी। जब आम के पेड़ पर फल लगने का मौसम आया, तो बाग़ का मालिक रोज़ आकर देखता कि कब आम पकें और वह उन्हें तोड़े।

बच्चों ने चिड़िया को बताया कि आज मालिक कह रहा था कि फल पक गए हैं, अब इन्हें तोड़ लेना चाहिए। बच्चों को चिन्ता हुई कि कहीं हमारा घोंसला ही न टूट जाए। माँ ने कहा - ‘अभी कहा ही है न! तोड़े तो नहीं। तुम चिन्ता न करो।’ इस प्रकार कई दिन बीत गए। बच्चों ने माँ को बताया कि आज मालिक कह रहा था कि मैं दो-चार आदमियों के साथ मिलकर ये आम तोड़ लूँगा। माँ ने कहा - ‘अभी कहा ही है न! आदमियों को लाया तो नहीं।’ बच्चों ने बताया कि मालिक कह रहा था कि उसे आदमी तो मिले नहीं, वह ख़ुद ही इन्हें तोड़ेगा। अब माँ ने कहा - ‘तुम कल उड़ने के लिए तैयार रहना। वह कभी भी आ सकता है।’ अब तक बच्चे भी उड़ना सीख गए थे। अगले दिन चिड़िया उस आदमी के आने से पहले ही अपने बच्चों के साथ वहां से उड़ गई थी।

जीवन में समस्याओं और दुर्घटनाओं की कल्पना मत करो जब वह आ जाए तो केवल उनका सामना करो -

एक समय की बात है, एक प्रसिद्ध चित्रकार अपनी सबसे बेहतरीन कलाकृति बना रहा था। वह एक ऊंचे पहाड़ की चोटी पर खड़ा होकर कैनवास पर रंग भर रहा था।

अपनी पेंटिंग को अंतिम रूप देने के बाद, वह उसे निहारने के लिए धीरे-धीरे पीछे हटने लगा। वह अपनी धुन में इतना खोया था कि उसे अहसास ही नहीं हुआ कि वह बिल्कुल खाई के किनारे तक पहुँच चुका है। एक कदम और, और वह गहरी खाई में गिर जाता।

पास ही खड़ा उसका एक शिष्य यह देख रहा था। उसने गुरु को आवाज नहीं दी, क्योंकि उसे डर था कि अचानक आवाज सुनकर गुरु घबराकर गिर सकते हैं। उसने तुरंत पास पड़ा एक पत्थर उठाया और गुरु की सबसे सुंदर पेंटिंग पर दे मारा।

पेंटिंग खराब होते देख गुरु गुस्से में तेजी से आगे की तरफ झपटे। वे चिल्लाए, "तुमने मेरी सालों की मेहनत बर्बाद क्यों कर दी?"

शिष्य ने शांत भाव से खाई की ओर इशारा किया और कहा, "गुरुजी, अगर मैं आपकी पेंटिंग खराब नहीं करता, तो अब तक आप अपनी जान गंवा चुके होते।"

सीख: हम अक्सर भविष्य की उन समस्याओं या दुर्घटनाओं की कल्पना करके डरते हैं जो शायद कभी होंगी ही नहीं। यह कहानी सिखाती है कि जीवन में जब कोई विपत्ति आए, तभी उसका डटकर सामना करना चाहिए। चिंता में डूबने के बजाय, वर्तमान में रहकर सही कदम उठाना ही बुद्धिमानी है।

अतः शांत मन से सोचने पर कोई भी समस्या या दुर्घटना तुम पर हावी नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त तुम्हारे किसी भी दुःख में तुम्हें अकेला नहीं छोड़ा जाता। तुम चाहे किसी भी परिस्थिति में हों, वह परमपिता परमात्मा और त्रिकालदर्शी हमेशा तुम्हारे साथ है। चाहे सारा संसार तुम्हें छोड़ दे, लेकिन परमात्मा तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा। इसलिए कभी दिल छोटा न करो और हमेशा इस सिद्धांत को याद रखो - ‘जब समस्याएं आती हैं, तो उनका सामना करो। उन में लीन या चिन्तित और स्थिर रह कर समय नष्ट न करो।’

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 



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