आज की कहानी

 आज की कहानी 


"जिस चौखट पर कल तक खुशियों की रंगोली सजती थी, आज उसी चौखट पर बैंक का 'नीलामी नोटिस' चिपका था। पर बुढ़ापे की लाठी बनने वाला बेटा घर बचाने के बजाय अपनी नई गृहस्थी के सपने सजा रहा था।"

​शाम का धुंधलका कानपुर की तंग गलियों में फैल रहा था। 'दीनानाथ क्लॉथ हाउस' का शटर पिछले पंद्रह दिनों से नहीं खुला था। उस लोहे के शटर पर चिपका सफेद कागज दीनानाथ जी की 40 साल की ईमानदारी की धज्जियां उड़ा रहा था। घर के अंदर सन्नाटा इतना गहरा था कि सुमित्रा जी की सिसकियों की आवाज़ भी गूंज रही थी।

​दीनानाथ जी अपनी पुरानी चारपाई पर पत्थर की मूरत बने बैठे थे। उनके सामने उनका इकलौता बेटा, अविनाश खड़ा था। उसके चेहरे पर दु:ख नहीं, बल्कि एक अजीब सी बेरुखी थी।

​"पापा, मैंने पहले ही कहा था कि इस पुरानी दुकान और इन पुराने तौर-तरीकों से अब काम नहीं चलेगा। लेकिन आपको तो अपनी 'विरासत' प्यारी थी। अब देखिए, 20 लाख का कर्ज़ा है। बैंक वाले कभी भी हमें बाहर निकाल देंगे," अविनाश ने ठंडे स्वर में कहा।

​सुमित्रा जी ने कांपते हाथों से बेटे का हाथ पकड़ा, "बेटा, तेरे पापा की हालत देख, सदमे से बोल नहीं पा रहे हैं। तू तो बड़े बैंक में अफसर है, क्या तू कुछ नहीं कर सकता? अपनी तनख्वाह से कुछ किश्तें बंधवा ले, हमारा ये सिर छिपाने का ठिकाना बच जाएगा।"

​अविनाश ने झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया, "माँ, आप कैसी बातें कर रही हैं? मेरी पत्नी, प्रिया, इस टूटे-फूटे घर और इस माहौल में नहीं रह सकती। हमने शहर के पॉश इलाके में एक नया 3-बीएचके फ्लैट बुक कर लिया है। मेरी पूरी सैलरी तो उसकी ईएमआई (EMI) में चली जाएगी। मैं इस मलबे को बचाने के लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर नहीं लगा सकता। 

आप लोग ये घर नीलाम होने दीजिए, जो थोड़े-बहुत पैसे बचेंगे, उससे कहीं छोटा-सा कमरा किराए पर ले लेना। मैं और प्रिया कल सुबह यहाँ से शिफ्ट हो रहे हैं।"

​दीनानाथ जी की आँखों से एक आंसू टपका और उनके कुर्ते पर जज़्ब हो गया। जिस बेटे को उन्होंने धूप में जलकर और खुद भूखे रहकर पढ़ाया, वही बेटा आज आंधी आने पर अपनी कश्ती अलग कर रहा था।

​तभी, हवेली के भारी दरवाज़े के खुलने की चीख सुनाई दी। दरवाजे पर उनकी बेटी, अंजली खड़ी थी। अंजली, जो दूसरे शहर में एक लीडिंग फर्म में प्रोजेक्ट हेड थी, बिना किसी सूचना के आई थी। उसने अविनाश की आखिरी बातें सुन ली थीं।

​अंजली ने अपना बैग सोफे पर पटका और सीधे अपने भाई के सामने जा खड़ी हुई।

​"भैया, जब इसी दुकान के पैसों से आपकी कॉलेज की फीस भरनी थी, तब तो ये दुकान आपको मंदिर लगती थी? जब इसी घर के आंगन में आपकी शादी का शामियाना सजा था, तब तो ये आपको मलबा नहीं लगा? आज जब पिता जी की हिम्मत टूट गई, तो आप उन्हें बेघर करने की बात कर रहे हैं?" अंजली की आवाज़ में बिजली सी कड़क थी।

​अविनाश ने चिढ़कर कहा, "अंजली, तू अब इस घर की मेहमान है। अपनी हद में रह। ये जज़्बातों का नहीं, पैसों का मामला है। अगर इतनी ही फिक्र है, तो खुद क्यों नहीं कुछ करती? जा, संभाल ले इन्हें, मैं तो चला।" अविनाश बड़बड़ाता हुआ अपने कमरे की ओर मुड़ गया।

​अंजली ने देखा, उसके पिता की नज़रें झुकी हुई थीं। उन्हें हमेशा लगता था कि बेटियाँ तो 'पराया धन' हैं, वंश तो बेटा चलाएगा। आज वह भ्रम शीशे की तरह टूट गया था।

​अंजली अपने पिता के पैरों के पास बैठ गई और उनके ठंडे पड़ते हाथों को अपने हाथों में ले लिया। 

"पापा, आप कहीं नहीं जाएंगे। ये घर आपकी मेहनत का पसीना है और आपकी बेटी इसे बिकने नहीं देगी।"

​दीनानाथ जी ने रुंधे गले से कहा, "बेटा, 20 लाख का सवाल है। तू अपने ससुराल में क्या मुँह दिखाएगी? दुनिया कहेगी कि दामाद के टुकड़ों पर ससुर पल रहा है। मैं मर जाऊँगा, पर ये कलंक नहीं सहूँगा।"

​अंजली की आँखों में दृढ़ता थी, "पापा, समाज की इसी सोच ने तो आज आपको लाचार कर दिया है। मैं अपने पति से पैसे नहीं मांगूंगी। मैंने अपनी मेहनत से बचत की है, मेरे पास कंपनी के शेयर्स और बोनस हैं। और दूसरी बात, अगर एक बेटा शादी के बाद अपने माता-पिता का फर्ज़ उठा सकता है, तो एक पढ़ी-लिखी बेटी क्यों नहीं? क्या शादी के बाद मेरा खून पानी हो गया? क्या मेरे संस्कार बदल गए?"

​अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरण दुकान के शटर पर पड़ी, तो वहां बैंक का नोटिस नहीं था। अंजली ने अपनी सालों की जमा-पूंजी से बैंक का बड़ा हिस्सा चुका दिया था और बाकी के लिए अपने करियर की गारंटी पर लोन को रीस्ट्रक्चर कराया था।

​शाम को जब अंजली घर लौटी, तो उसके हाथ में दुकान की चाबियां थीं। अविनाश अपना सामान बांधकर जा चुका था, लेकिन घर में कोई खालीपन नहीं था।

​अंजली ने अपने पति, आर्यन को वीडियो कॉल किया। आर्यन ने गर्व से मुस्कुराते हुए कहा, "अंजली, तुमने जो किया वही सही था। अगर मेरी माँ मेरी ज़िम्मेदारी है, तो तुम्हारे पिता जी भी मेरे पिता समान हैं। तुम वहीं रुको और दुकान को दोबारा पैरों पर खड़ा करो, मैं हर वीकेंड तुम्हारे साथ रहूँगा।"

​अगले तीन महीनों में अंजली ने दुकान का हुलिया बदल दिया। उसने पारंपरिक कपड़ों को 'ई-कॉमर्स' और 'सोशल मीडिया' के ज़रिए युवाओं तक पहुँचाया। दीनानाथ जी, जो कल तक चारपाई से नहीं उठ पा रहे थे, आज गर्व से अपनी गद्दी पर बैठकर ग्राहकों का स्वागत कर रहे थे।

​एक दिन चाय पीते हुए दीनानाथ जी ने अंजली के सिर पर हाथ रखा। उनकी आँखों में ग्लानि और गर्व का मिला-जुला भाव था।

​"बेटा, मुझे माफ़ कर देना। मैंने पूरी ज़िंदगी 'वंश' के पीछे भागते हुए तुझे 'पराया' समझा। लेकिन आज तूने साबित कर दिया कि बेटा सिर्फ नाम देता है, पर बेटी तो कुल की लाज और जान होती है। तू मेरा 'कन्यादान' नहीं, तू मेरा 'अभिमान' है।"

​** यह कहानी उन सभी के लिए एक सबक है जो आज भी बेटियों को बोझ या पराया समझते हैं। सक्षम बेटियां सिर्फ अपने ससुराल का गौरव नहीं होतीं, बल्कि अपने मायके की डूबती कश्ती को बचाने वाला मांझी भी होती हैं।

​अगर यह कहानी आपके दिल तक पहुँची, तो इसे शेयर ज़रूर करें और कमेंट में बताएं — क्या आज भी बेटियों को अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए समाज से लड़ना पड़ता हैं ।

आप सभी का दिन शुभ हो...... 🙏🏻😊

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

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