Be above limitations of life.
जीवन की सीमाओं से ऊपर उठो।Be above limitations of
life.
तुम्हारे जीवन में कुछ बंधन हो सकते हैं जो तुम्हें उन्नति करने से रोकते हैं, यद्यपि तुम उन्नति करना चाहते हो। कृपया नोट करें कि ये सब सीमाएं कर्मों के नियम और भाग्य के नियम के अनुसार हैं। तुम्हारे पिछले कर्मों के अलावा किसी को दोष नहीं दिया जा सकता। इसलिए अपने को, भगवान को या अन्यों को कोसने का कोई लाभ नहीं है। यह भी सच है कि इन में से बहुत सी सीमाएं तुम्हारे द्वारा एक रात में नहीं हटाई जा सकती अर्थात् तुम्हें उनके साथ ही रहना होगा। लेकिन याद रखो कि तुम्हारी कैसी भी अवस्थाएं या सीमाएं हैं, तुम कुछ न कुछ परिवर्तन हमेशा कर सकते हो। ये छोटे बदलाव एक बड़े बदलाव का रास्ता बना देंगे। किसी के लिए सभी दरवाज़े कभी बंद नहीं होते। हरेक को आगे बढ़ने का और कर्मों के नियम के दुष्चक्र से बाहर आने का एक मौका दिया जाता है, चाहे व्यक्ति के कितने ही बुरे कर्म क्यों न हों। किसी को चिर-नरक का दण्ड नहीं मिलता।
एक छोटे से गाँव में आर्यन नाम का एक मूर्तिकार रहता था। वह पत्थर के बेजान टुकड़ों में भी जान फूंक देने की कला जानता था। एक बार उसने निश्चय किया कि वह ‘जीवन की सीमाओं’ को दर्शाती एक अद्वितीय मूर्ति बनाएगा।
वह एक विशाल पहाड़ की चोटी पर गया और वहां एक भारी पत्थर चुनकर तराशना शुरू किया। जैसे-जैसे मूर्ति का आकार उभरता, आर्यन को थकान और प्यास महसूस होती। कई बार उसके औज़ार टूट जाते और तेज़ हवाएँ उसका काम रोक देतीं।
गाँव के लोग उसे देखते और कहते, ‘आर्यन, तुम प्रकृति की सीमाओं से नहीं लड़ सकते। मनुष्य का शरीर थक जाता है, भूख लगती है। नीचे आओ और आराम करो।’
आर्यन ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, ‘शरीर की सीमाएं केवल तब तक हैं जब तक मन उन्हें स्वीकार करता है।’
उसने अपनी भूख को संकल्प की ऊर्जा बनाया और अपनी थकान को एकाग्रता में बदल दिया। कई महीनों की तपस्या के बाद, उसने एक ऐसी मूर्ति तैयार की, जिसमें एक मनुष्य को बादलों के ऊपर पंख फैलाकर उड़ते हुए दिखाया गया था। उसकी आँखों में अद्भुत चमक थी।
जब लोगों ने वह मूर्ति देखी, तो वे दंग रह गए। उन्हें लगा ही नहीं कि यह पत्थर की है; ऐसा लग रहा था मानो वह अभी उड़ जाएगी। आर्यन ने सिद्ध कर दिया कि जब हम अपनी मानसिक बाधाओं को पार कर लेते हैं, तो हम शारीरिक और सांसारिक सीमाओं से बहुत ऊपर उठ जाते हैं।
सीख - हमारी असली सीमाएं हमारे भीतर हैं। जिस दिन हम अपनी सोच को सीमाओं से मुक्त कर लेते हैं, उस दिन हम असंभव को भी संभव बना सकते हैं।
इसलिए अपनी कोशिशों, दृढ़ निश्चयों और अपनी स्वतंत्र इच्छा शक्ति का प्रयोग करके तुम धीरे-धीरे अपने भाग्य के दुष्प्रभाव को परास्त कर सकते हो और अपने भाग्य से ऊपर उठ सकते हो। इस अवस्था में पहुँचने पर, तुम्हारा दुर्भाग्य तुम्हें विचलित नहीं कर सकेगा, बल्कि तुम अपने भाग्य और अपने जीवन की क्रियाओं का क्रम स्वयं निश्चित करोगे। अपनी कोशिशों, दृढ़ निश्चयों और अपनी स्वतंत्र इच्छा शक्ति से तुम न केवल अपने भाग्य को बदल सकते हो, बल्कि इसे पूर्ण रूप से ऊँचा उठा सकते हो। यदि तुम्हारे अन्दर एक मज़बूत चाहत, इच्छा शक्ति और सही वजह के लिए काम करने की ताकत है तो इस पृथ्वी या स्वर्ग में ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो तुम्हारी सफलता को रोक सके। विश्व की सभी ताकतें तुम्हें लक्ष्य प्राप्त करने में सहारा देंगी।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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