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Showing posts from January, 2026

Always remain optimistic.

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  हमेशा आशावादी रहो।  Always remain optimistic. इस का महत्त्व नहीं है कि तुम्हें अपने काम के लक्ष्य को प्राप्त करने में कितनी असफलताएं मिली, तुम तो बस! अपनी सफलता के बारे में आशावादी रहो। यदि तुमने उचित कारण से लक्ष्य निर्धारित किया है, तो याद रखो कि इस पृथ्वी पर या स्वर्ग में ऐसी कोई ताकत नहीं है, जो तुम्हें तुम्हारी इच्छित वस्तु प्राप्त करने के लिए रोक सके। आवश्यकता है केवल भगवान में अटूट विश्वास के साथ दृढ़ निश्चय की। यह भी याद रखो कि तुम्हारे द्वारा किया गया छोटा सा प्रयत्न भी व्यर्थ नहीं जाता। यह प्रकृति का नियम है। कई तरह से किये गए प्रयत्न, संघर्ष व तुम्हारे द्वारा किया गया परिश्रम जल्दी या देर से निश्चय ही तुम्हेंं फल देगा।  एक बहुत ही छोटा लगभग सात साल का बालक था। वह बहुत बुद्धिमान था। उसका नाम आलोक था। उसके पिता सेठ धनीराम एक व्यापारी थे। आलोक जब पांच वर्ष का था, तभी उसकी माँ उसे छोड़ कर भगवान के पास चली गयी। बेचारा आलोक अब हमेशा उदास रहने लगा।  उसके पिता को जब व्यापार से समय मिलता, तो उसके साथ समय बिताते थे। यूँ तो आलोक के पिता आलोक से बहुत प्यार करते थे, कि...

Eliminate ego

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  अहंकार और कर्त्तापन के भाव से बचो। Eliminate ego and doership feeling. जो भी काम या बातें तुम करते हो, उनमें यह भावना रखो कि यह भगवान का काम है और तुम उसके प्रतिनिधि के रूप में उसके निर्देशन में काम कर रहे हो। वह ही असली कर्त्ता है। तुम भगवान के हाथों में एक उपकरण या केवल एक माध्यम हो। वह काम समाप्त होने के बाद श्रद्धा और मानवीयता के साथ भगवान को समर्पित कर दो। कभी भी अभिमान या अहंकार न बढ़ाओ कि ये तुम ही हो, जो यह काम कर सकते हो और इस के लिए अब तुम प्रशंसा और इनाम पाने की भी उम्मीद रखते हो। एक गांव में एक मूर्तिकार रहता था, जो इतनी जीवंत मूर्तियाँ बनाता था कि देखने वाले दंग रह जाते थे। धीरे-धीरे उसके मन में यह अहंकार बैठ गया कि “मैं” ही श्रेष्ठ कलाकार हूँ। एक रात उसे सपना आया कि अगले सात दिनों में उसकी मृत्यु निश्चित है। यमदूतों को चकमा देने के लिए उसने अपनी ही जैसी दस हूबहू मूर्तियाँ बनाईं और खुद उनके बीच जाकर बैठ गया। जब यमदूत आए, तो वे ग्यारह एक जैसे चेहरों को देखकर चकित रह गए। वे पहचान ही नहीं पा रहे थे कि असली कलाकार कौन है। यमदूत वापस लौट गए और यमराज को सब बताया। यमराज मुस्...

Avoid making advice to others

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   जब तक पूछा न जाय तब तक दूसरों की आलोचना करने व टिप्पणी या नसीहत देने से बचो।  Avoid making remarks / comments / advice to others unless asked. जीवन में केवल अपनी उन्नति की ओर ध्यान दो। दूसरे क्या कर रहे हैं इस विषय में चिन्ता करने या दख़ल देने में समय को नष्ट न करो। दूसरों के कामों के बारे में आलोचना, टिप्पणी और उन के दोष ढूँढने से बचो। कुछ लोगों को हरेक को अनावश्यक सलाह देने की आदत होती है, चाहे पूछी गई हो या नहीं। यहाँ भी तुम्हें केवल पूछने पर ही नसीहत देनी चाहिए और यदि तुम मामले से परिचित नहीं हो तो ग़लत और अस्पष्ट नसीहत देने की बजाय क्षमा मांग लेनी चाहिए। इसी प्रकार कोई शिक्षा जो तुम दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिए देना चाहते हो, उसे शब्दों से देने के स्थान पर अपने व्यवहार से दो। तब उसका अधिक प्रभाव होगा। यह भी याद रखो कि तुम किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के बिना नहीं मोड़ सकते। बिना मांगे नसीहत न दो (Don't give advice without being asked) विषय पर एक लघुकथा यहाँ दी गई है, जो बताती है कि कैसे अनावश्यक सलाह देना अक्सर उल्टा पड़ जाता है, और सच्ची समझदारी तब दिखती है जब ह...

Be positive

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  व्यर्थ की बातों से यानि कचरे से अपने अवचेतन मन को मत भरो।  Don’t fill your sub concious mind with all sorts of garbage. तुम्हारा अवचेतन मन चेतन मन के द्वारा ग्रहण होने वाले विचारों का बहुत बड़ा भण्डार है। जो कुछ तुम देखते, सुनते, सोचते और अनुभव करते हो, वह सब स्थाई स्मृति के रूप में यहां इकट्ठा हो जाता है, लेकिन समस्यात्मक भाग यह है कि अपने विचारों और इन्द्रिय प्रभावों के साथ-साथ हम इसमें बहुत-सा भावनात्मक कचरा और नकारात्मकता जैसे घृणा, बदला, डर, क्रोध, ईर्ष्या आदि अनजाने में, लगातार और निर्दयतापूर्वक उड़ेलते रहते हैं, जो असल में हमारी बरबादी का कारण बनता है। कई लोग हमारे पक्ष में होते हैं, तो कुछ लोग हमारे विपक्ष में भी होते हैं। जो लोग विपक्ष में होते हैं, वे लगातार हमारी बुराई करते हैं। हम कुछ भी करें, ऐसे लोग सिर्फ हमारे विरुद्ध गलत बातें ही प्रचारित करते हैं। ऐसे लोगों से बचना चाहिए। इस संबंध में एक लोक कथा प्रचलित है। एक संत और उनका शिष्य एक गांव से दूसरे गांव लगातार यात्राएं करते थे। इस दौरान वे अलग-अलग गांवों में रुकते भी थे। संत बहुत विद्वान थे। उनके प्रवचन सुनने के ल...

Accept your weaknesses.

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   अपनी कमियों को स्वीकार करो और पहचानो। Accept  and  recognise your weaknesses. एक बार तुम अपनी कमियों को पहचान लेते हो तो समझो तुमने पहले ही उन्हें दूर करने का पहला कदम उठा लिएा है। औरों के सामने अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए और वास्तविकता को छिपाने की कोशिश भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति में स्वाभाविक रूप से कोई न कोई कमी होती है  और उसे स्वीकार भी किया जाना चाहिए।  एक जंगल में एक गधा रहता था, जो हमेशा शेर की तरह दहाड़ने की कोशिश करता रहता था। वह चाहता था कि सब उससे डरें और उसकी ताकत का लोहा मानें, लेकिन जब भी वह दहाड़ता, उसके मुख से सिर्फ़ गधों जैसी ही आवाज़ निकलती और सब जानवर उस पर हँसते थे। गधा बहुत दुःखी होता और रोने लगता। एक दिन एक संत वहाँ से गुज़रे। उन्होंने गधे को उदास देखा और पूछा,"क्या बात है, तुम इतने दुखी क्यों हो?" गधे ने रोते हुए कहा, "संत जी! मैं शेर की तरह दहाड़ना चाहता हूँ, लेकिन मेरी आवाज़ इतनी कमज़ोर है कि सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। मैं अपनी इस कमी से बहुत परेशान हूँ।" संत मुस्कुराए और बोले,"मेरे ...

Self-satisfaction

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  दूसरों को सन्तुष्ट करने से पहले अपने आप को सन्तुष्ट करें। Self-satisfaction before satisfaction of others. पुराने समय की बात है, एक गाँव में दो किसान रहते थे। दोनों ही बहुत ग़रीब थे, दोनों के पास थोड़ी थोड़ी ज़मीन थी। दोनों उसमें ही मेहनत करके अपना और अपने परिवार का गुज़ारा चलाते थे। अकस्मात् कुछ समय पश्चात दोनों की एक ही दिन एक ही समय पर मृत्यु हो गयी। यमराज दोनों को एक साथ भगवान के पास ले गए। भगवान ने उन्हें देख कर उनसे पूछा - अब तुम्हें क्या चाहिये? तुम्हारे इस जीवन में क्या कमी थी और अब तुम्हें क्या बना कर मैं पुनः संसार में भेजूं?  भगवान की बात सुनकर उनमें से एक किसान बड़े गुस्से से बोला -  हे भगवान! आपने इस जन्म में मुझे बहुत कष्टमय ज़िन्दगी दी थी। आपने कुछ भी नहीं दिया था मुझे। पूरी ज़िन्दगी मैंने बैल की तरह खेतों में काम किया है। जो कुछ भी कमाया, वह बस पेट भरने में लगा दिया। न ही मैं कभी अच्छे कपड़े पहन पाया और न ही कभी अपने परिवार को अच्छा खाना खिला पाया। जो भी पैसे कमाता था, कोई आकर मुझसे लेकर चला जाता था और मेरे हाथ में कुछ भी नहीं आया। देखो! कैसी जानवरों जैसी ज़िन्दगी...

master of destiny

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 तुम अपने भाग्य के स्वामी स्वयं हो  You are master of your destiny. जो लोग विपत्ति का सामना करते समय अपने भाग्य को कोसना शुरू कर देते हैं, वे कृपया याद रखें कि तुम अपने जीवन में जो भी हो, उस के जिम्मेदार शत-प्रतिशत तुम ही हो। तुमने अपना भाग्य अपने हाथों से बनाया है। तुम्हारे भूतकाल ने तुम्हारा वर्तमान बनाया है और तुम्हारा वर्तमान तुम्हारा भविष्य बनाएगा। जो तुमने पहले किया है, उसी का फल तुम्हें आज मिल रहा है। यदि तुम अपने वर्तमान को सावधानी से अपने अधीन रखते हो तो भविष्य अभी भी तुम्हारे हाथ में है। इसलिए विपत्तियों के लिए भाग्य को मत कोसो, बल्कि वास्तविकता का साहस से सामना करो। जीवन के प्रति उत्तरदायित्व को स्वीकार करो और अनुभव करो कि तुम्हारे विचार, शब्द और क्रियाएं ही तुम्हारा भविष्य बनाती हैं और जीवन के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं। तुम अपने अन्दर छिपी बड़ी शक्ति के द्वारा अपने वर्तमान भाग्य को बदल भी सकते हो और सुधार भी सकते हो। तुम्हें भाग्य के हाथों असहाय दास बनने की आवष्यकता नहीं है। विभिन्न बाधाओं के विरुद्ध सकारात्मक सोच का अभ्यास करके और दृढ़ इच...

past and future

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भूतकाल के प्रति खिन्न या भविष्य के प्रति चिन्तित न हों।  Brooding over past and worring for future कई लोग इन्हीं दोनों कामों में अपनी सारी ज़िन्दगी बेकार गंवा देते हैं। यह निश्चित है कि जो कुछ तुम्हें भूतकाल में करना चाहिए था, उसको सुधारने के लिए अब तुम कुछ नहीं कर सकोगे, लेकिन उसके लिए वर्तमान को बिगाड़ना भी तो बुद्धिमानी नहीं है। इसी प्रकार भविष्य, जिसे हम पहले से नहीं जानते, उस के लिए चिंता करके भी अपने वर्तमान को बिगाड़ना बुद्धिमानी नहीं है। वास्तव में इन सब चिंताओं में लीन हो कर न केवल अपने वर्तमान को बल्कि हम जानबूझ कर अपने भविष्य को भी बिगाड़ रहे हैं। एक गाँव में रामू नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह हमेशा दो चिंताओं में घिरा रहता था - एक, ‘जो हो गया’ उसका अफसोस और दूसरा, ‘आगे क्या होगा’ उसकी घबराहट। वह अक्सर अपनी पुरानी गलतियों पर पछताता और भविष्य की अनिश्चितताओं से डरता। एक दिन, वह एक बूढ़े साधु के पास पहुँचा, जो नदी किनारे ध्यान कर रहे थे। रामू ने उनसे अपनी समस्या बताई। साधु मुस्कुराए और बोले, “रामू, तुम समय के पहिये में फंसे हो। अतीत एक बीता हुआ पन्ना है, जिसे बदला नहीं जा सकता,...

गीता सार

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गीता सार वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से व्यर्थ  चिन्तित हो रहे हो व्यर्थ डर कर रो रहे हो अजन्मा है अमर आत्मा भय में जीवन खो रहे हो (1) जो हुआ अच्छा हुआ जो हो रहा है अच्छा ही है होगा जो अच्छा ही होगा ये नियम सच्चा ही है गर भुला दो बोझ कल का आज तुम जो ढो रहे हो अजन्मा है अमर आत्मा भय में जीवन खो रहे हो ........ (2) जिस को तुम मृत्यु समझते है वही जीवन तुम्हारा है नियम जग का बदलना क्या पराया क्या तुम्हारा एक क्षण में कंगाल हो क्षण भर में धन से मोह रहे हो अजन्मा है अमर आत्मा भय में जीवन खो रहे हो....... (3) है किराए का मकान न हो तुम इस के, न ये तुम्हारा पँच तत्त्वों का बना घर यह देह है कुछ दिन का सहारा इस मकान में हो मुसाफ़िर किस कदर यूँ सो रहे हो अजन्मा है अमर आत्मा भय में जीवन खो रहे हो........ (4) क्या गया तुम रो पड़े हो तुम लाए क्या थे जो खो दिया व्यर्थ ग्लानि से भरा मन आँसुओं से जो धो रहे हो अजन्मा है अमर आत्मा भय में जीवन खो रहे हो........ (5) हुई भूलों का फिर आज पश्चाताप क्यों कल क्या होगा अनिश्चित आज फिर संताप क्यों जुट पड़ो कर्त्तव्य में तुम ब...

क्षणिकाएँ

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  क्षणिकाएँ वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से   रिश्ते और रास्ते रिश्तों और रास्तों के बीच एक अजीब रिश्ता होता है , कभी रिश्तों में रास्ते मिल जाते हैं कभी रास्तों में रिश्ते बन जाते हैं इसलिए चलते रहिए , रिश्ते निभाते रहिए ख़ुशियाँ तो चन्दन की तरह होती हैं दूसरों के माथे पर लगाएंगे तो , अपनी अंगुलियाँ भी महक जाएंगी। यह शाश्वत सत्य है।   फ़िक्र और ज़िक्र ज़िन्दगी हमने गुज़ार दी बच्चों की फ़िक्र करने में , अब बच्चे व्यस्त हैं हमारी कमियों का ज़िक्र करने में , पता नहीं बुरे हम हैं , या ज़माना हमारी नज़र में , फिर भी कोशिश करते हैं , घर के मसले निपट जाएं , घर की घर में। पर ऐसा लगता नहीं   - वेद गावड़ी   निरोगता का सूत्र धन खर्चियां गल बणदी नाहीं भावे लखा दे टीके लवाइए डाकटरां कोल गयां वी गल बणदी नाहीं भावे देश विदेश घुमाइए मन्नता मनियां वी गल बणदी नाहीं भावे मन्दिरा तीर्थां ते घुम - घ...