Reduce worldly involvement.
अनावश्यक सांसारिक भागीदारी को कम करो।Reduce unnecessary worldly
involvement.
दुनिया एक बड़े जंगल के समान है। जितना तुम इसके अन्दर जाओगे, उतना ही तुम भ्रमित हो जाओगे और खो जाओगे। अतः सांसारिक कामों में केवल एक सीमा तक ही शामिल होओ जो तुम्हारे जीवित रहने और सांसारिक कर्त्तव्यों को निभाने के लिए आवश्यक हों।
सांसारिक भागीदारी कम करो।
एक समय की बात है, एक शहर में राघव नाम का व्यक्ति रहता था। वह बहुत मेहनती था, लेकिन अपनी मेहनत से ज़्यादा, दूसरों के मामलों में दखल देने और सांसारिक बातों में फंसा रहता था। पड़ोसी के घर क्या बन रहा है, दफ्तर में कौन किससे राजनीति कर रहा है, दुनिया में क्या हो रहा है- इन सबमें उसे बहुत दिलचस्पी थी। इस चक्कर में वह अक्सर तनाव में रहता और अपने परिवार को समय नहीं दे पाता था।
एक दिन वह एक संत के पास गया और बोला, “महाराज, मैं बहुत अशांत रहता हूँ। मन में हमेशा हलचल रहती है।“
संत मुस्कुराए और बोले, “तुम बहुत बोझ उठा रहे हो। अपनी सांसारिक भागीदारी कम करो।“
राघव ने पूछा, “इसका क्या मतलब है?“
संत ने कहा, “कल सुबह नदी किनारे आना।“
अगले दिन सुबह राघव नदी किनारे पहुँचा। संत ने उसे एक नाव में बैठने को कहा। नाव पानी के बीच में थी, तब संत ने उसे एक थैला दिया और उसमें भारी पत्थर भरने को कहा।
राघव ने पत्थर भरे। नाव भारी हो गई और पानी के स्तर के पास आ गई। फिर संत ने कहा, “अब और पत्थर डालो।“
राघव झिझका, “महाराज, नाव डूब जाएगी!“
संत ने शांत भाव से कहा, “बस यही तो मैं तुम्हें समझाना चाहता हूँ। सांसारिक चिंताएं, लोगों के बारे में धारणाएं, और व्यर्थ की बातों में भागीदारी ये भारी पत्थर ही हैं। तुम इन्हें उठाते जा रहे हो, नाव (जीवन) डूबने ही वाली है। अगर शांति चाहते हो, तो उन पत्थरों को नदी में फेंक दो।“
राघव को बात समझ आ गई। उसने पत्थर नदी में फेंक दिए और नाव हल्की हो गई।
सीखः
जीवन की नाव को शांति से चलाने के लिए, सांसारिक भागीदारी (व्यर्थ की चिंताओं और दूसरों के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप) को कम करना आवश्यक है। तभी आप ’आसक्ति में अनासक्ति’ (Detachment in Attachment) को अपना पाएंगे।
अनावश्यक उलझना, अनावश्यक इधर उधर घूमना, दूसरों के कामों में और सार्वजनिक निन्दा; जो हमेशा अधिक मात्रा में होती है, में अपनी नाक घुसाना और ताक-झांक करना बंद कर दो। सांसारिक बातों में अनावश्यक रूप से शामिल होने से इन्द्रियों और मन की एकाग्रता का विलोप हो जाता है जो तुम्हारी मानसिक शान्ति और आध्यात्मिक उन्नति में बाधक है।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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