Reduce collection

 सांसारिक वस्तुओं को इकट्ठा करना कम कर दो।

Reduce collection of worldly things.

कम से कम सीमा तक अपनी सांसारिक वस्तुओं व ऐशो आराम की वस्तुओं को सीमित कर दो, जो तुम्हारे जीवित रहने या मूलभूत आराम के लिए आवश्यक हों। सामान्यतया यह देखा गया है कि हम अपनी आवश्यकताओं से अधिक इकट्ठा कर लेते हैं।

अधिक से अधिक वस्तुओं को इकट्ठा करना और समेट कर रखना, चाहे हमें उसकी आवश्यकता हो या न हो, हमारे लिए और अधिक उलझनें ले आएगा। उनको सुरक्षित रखने के तनाव के कारण हमारी शक्ति का अपव्यय होने लगेगा, उन की लगातार सार-संभाल में समय नष्ट होगा और उनको रखने में भी स्थान घिरेगा।

कुछ समय के बाद हमारे घर या दफ़्तर में कुछ पुरानी रद्दी वस्तुएं इकट्ठी हो जाती हैं जिनकी हमें आवश्यकता नहीं होती। रद्दी वस्तुओं को रखना व अनुपयोगी होने के कारण उनकी सुरक्षा करना अपनी ऊर्जा पर एक प्रकार का टैक्स है। 

असली खजाना

एक गाँव में रमन नाम का एक बहुत अमीर व्यापारी रहता था। उसके पास आलीशान घर, नौकर-चाकर और ढेर सारा सोना-चांदी था, लेकिन रमन का मन कभी शांत नहीं रहता था। उसे हमेशा और अधिक धन और सांसारिक वस्तुएं इकट्ठा करने की धुन सवार रहती थी।

उसका पड़ोसी, सोहन, एक साधारण किसान था। सोहन के पास बहुत कम संपत्ति थी, लेकिन वह बहुत खुश और संतुष्ट था। रमन अक्सर सोहन की खुशी का कारण समझ नहीं पाता था और उससे ईर्ष्या करता था।

एक दिन रमन ने सोचा, “मैं सोहन को बहुत सारा धन दे देता हूँ। जब इसके पास सांसारिक चीजें होंगी, तो मेरा मन भी शांत हो जाएगा कि मेरे आसपास के लोग भी धनी हैं।“ रमन ने सोहन को एक संदूक भरकर सोने के सिक्के दिए।

सोहन ने संदूक स्वीकार तो कर लिया, लेकिन वह उसकी नींद और चैन दोनों छीन ले गया। अब सोहन रात-भर जागकर संदूक की रक्षा करता, खिड़की-दरवाजे बंद रखता और सोचता कि चोर न आ जाएं। जो सोहन पहले बेफिक्र होकर सोता था, अब वह चिंतित रहने लगा।

कुछ दिन बाद, सोहन संदूक लेकर रमन के पास गया और संदूक वापस करते हुए बोला, “भाई रमन, यह धन वापस ले लो। इस धन ने मुझे सोने नहीं दिया। मुझे समझ आ गया है कि असली सुख और चैन सांसारिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि संतोष में है। मैं इन चीजों के बिना ही खुश था।“

रमन ने सोहन की बात समझी कि सांसारिक वस्तुओं का संग्रह करना ही दुःखों की जड़ है। उसे समझ आ गया कि सच्चा खजाना मन की शांति और संतोष है।

सीखः सांसारिक वस्तुओं का संग्रह करने से सुख नहीं, बल्कि चिंता बढ़ती है। जितना है, उसमें संतोष करना ही सुख का मूल मंत्र है।

नई वस्तुओं को स्थान देने के लिए हमें व्यर्थ के सामान को लगातार निकालने की आदत उत्पन्न करनी चाहिए। या तो व्यर्थ के सामान को बेच देना चाहिए या किसी ज़रूरतमंद को दान में दे देना चाहिए। पुराने व्यर्थ के सामान की सुरक्षा का तनाव लेना उचित नहीं है।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

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