Check your desires and craving for sensual enjoyment.



 अपनी इच्छाओं और इन्द्रिय सुख की लालसा पर नियंत्रण
करो। 
 Check your desires and craving for sensual enjoyment.

 

भौतिक इच्छाओं और इन्द्रिय सुखों की कोई सीमा नहीं है, जितना अधिक तुम्हें मिलेगा, उतना ही तुम पाना चाहोगे। एक इच्छा की पूर्ति दूसरी इच्छा को आमंत्रण देती है तथा यह शृंखला अंतहीन हो जाती है।

इसलिए अपनी इच्छाओं को अपनी आधारभूत आवश्यकताओं और आराम तक ही सीमित रखो और एक के बाद एक इच्छाओं के ढेर मत लगाओ और ऐश्वर्य की चीज़ों के पीछे मत भागो। भौतिक इच्छाओं के आनन्द और इन्द्रिय सुखों से प्राप्त ख़ुशी थोड़े समय के लिए होती है और दुःख से भरी होती है। यह स्थाई सन्तुष्टि नहीं देती।

इच्छाओं पर नियंत्रण न रखने से दुःख और मोह बढ़ता है, जबकि सीमित इच्छाएं ही सच्चे संतोष और सुख का मार्ग हैं। अनियंत्रित इच्छाएं चींटियों की बाम्बी की तरह बढ़ती रहती हैं। 

जादुई घड़ा और संतोष

एक गाँव में एक अत्यंत लालची किसान रहता था। उसने कड़ी मेहनत के बजाय जल्दी अमीर बनने की इच्छा पाल रखी थी। एक दिन उसे एक साधु से एक जादुई घड़ा मिला। साधु ने कहा, “इसमें तुम जो भी डालोगे, वह दोगुना हो जाएगा। लेकिन ध्यान रहे, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना, वरना यह घड़ा नष्ट हो जाएगा।“

किसान घड़ा घर ले आया। उसने उसमें एक रुपया डाला, तो दो हो गए। दस डाले, तो बीस हो गए। उसकी इच्छाओं की बाम्बी बढ़ती गई। उसने अपने सारे गहने, अनाज, यहाँ तक कि घर की कीमती वस्तुएं भी उसमें डाल दीं। वह संतुष्ट नहीं था। वह और अधिक चाहता था। 

अंत में उसे लगा कि अगर वह खुद को भी घड़े में डाल दे, तो उसके जैसे दो किसान बन जाएंगे। वह घड़े के अंदर घुस गया। इस पर घड़ा, जो लालच को सहन नहीं कर पाया, चटक गया और किसान फँस गया। अब किसान के पास न तो वह जादुई घड़ा था और न ही उसके द्वारा अर्जित की गई वस्तुएं।

सीखः इच्छाओं के अंतहीन वटवृक्ष को काट देने में ही सच्चा संतोष है। वरना लालच अंततः विनाश का कारण बनता है।

इसलिए हमें अपनी असीमित इच्छाओं और इन्द्रिय आनन्द की लालसाओं पर कस कर लगाम लगानी चाहिए। किसी बाह्य प्रेरक द्वारा हमेशा इन्द्रियों और मन को ख़ुश करना तुम्हारी निम्न प्रकृति का प्रतीक है। अपने अन्दर उच्च प्रकृति को जागृत करने के लिए हमेंं इस भावना पर विजय प्राप्त करनी है। हमें अपने अधिकतम विकास के लिए इस धरती पर मिलने वाले छोटे से समय का भी सदुपयोग करना है।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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