Live and work in this world

 अपनी सतत उन्नति का एकमात्र लक्ष्य लेकर इस दुनिया में
जीओ और काम करो।  
Live and work in this world with the sole aim of your constant development.

हम जो भी करते हों और चाहे जहां भी हों, जीवन में हमारा केन्द्रिय लक्ष्य लगातार शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास होना चाहिए। केवल यही एक वस्तु है जो हमारे साथ हमेशा रहेगी। अन्य सभी वस्तुएं जो नश्वर हैं जो अधिक समय के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। वे एक-एक करके हमें रास्ते में ही छोड़ जाएंगी।

जादुई आईनाः खुद को बदलो

बहुत पुरानी बात है। एक शहर में आर्यन नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत बुद्धिमान था, लेकिन उसे हर काम में दूसरों की कमियां निकालने और शिकायत करने की आदत थी। अपने नकारात्मक व्यवहार के कारण न तो उसके दोस्त थे और न ही वह ऑफिस में खुश था।

एक दिन वह एक ज्ञानी साधु के पास गया और बोला, “महाराज! मैं सब कुछ जानता हूँ, फिर भी सफल और खुश क्यों नहीं हूँ?“

साधु ने उसे एक छोटा-सा मटमैला आईना दिया और कहा, “इस आईने में तुम्हें अपना व्यक्तित्व दिखेगा। इसे एक महीने तक अपने पास रखो और जब भी किसी दूसरे में कमी ढूँढो, तो खुद को आईने में देख लेना।“

आर्यन ने आईना ले लिया। अगले दिन जब वह अपने सहकर्मी की गलती पर चिल्लाने वाला था, उसे साधु की बात याद आई। उसने आईना निकाला। उसमें उसे अपनी गुस्से वाली शक्ल दिखी, जो काफी बदसूरत लग रही थी। उसने खुद को रोकने की कोशिश की।

धीरे-धीरे वह दूसरों की बुराई करने के बजाय अपनी गलतियां सुधारने लगा। जब उसने लोगों की तारीफ करना, खुश रहना और अपनी गलतियों को स्वीकार करना शुरू किया, तो लोग उसके साथ रहना पसंद करने लगे।

एक महीने बाद वह साधु के पास गया, लेकिन इस बार वह खुश और शांत था।

साधु मुस्कुराए और बोले, “आईने में तो धूल थी, आर्यन! लेकिन जब तुमने अपनी सोच के नज़रिये को बदला, तो तुम्हें दुनिया खूबसूरत दिखने लगी। असली व्यक्तित्व विकास यही है कि आप दूसरों को बदलने के बजाय खुद में सुधार करें।“

कहानी की सीखः

व्यक्तित्व का विकास बाहरी रूप-रंग से नहीं, बल्कि सकारात्मक सोच-व्यवहार और व्यवहार में बदलाव से होता है। अपनी सोच बदलें, दुनिया बदल जाएगी।

कुछ लोग अपना जीवन इस प्रकार व्यतीत करते हैं जैसे कुछ भी करके उन्हें अपने जीवन का समय बिताना है। जब कुछ भी करने को नहीं होता, तो वे बोर हो जाते हैं और समय काटना मुश्किल हो जाता है। वे अपने व्यक्तित्त्व का वास्तविक विकास नहीं करना चाहते। जहां एक व्यक्ति का लक्ष्य सतत उन्नति होना चाहिए, वहीं अपने प्रयत्नों का परिणाम भगवान पर छोड़ देना चाहिए। इस प्रकार तुम ख़ुशी, ग़म और बोरियत के अत्याचार से आज़ाद हो जाओगे। तुम हमेशा एक अद्वितीय दैवीय आनन्द से परिपूर्ण रहोगे और क्षण-प्रतिक्षण अपने व्यक्तित्त्व के विकास के लिए और अधिक मज़बूत बनते जाओगे। इसके अतिरिक्त, हम दूसरों की और अपने समाज की सहायता तभी कर सकते हैं, जब हम ख़ुद विकसित व्यक्तित्त्व वाले होंगे। यदि हम ख़ुद ही कमज़ोर होंगे, तो हम दूसरों के लिए क्या कर सकेंगे?

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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