We must give hold of our life to GOD.

 अपने जीवन की डोर अपने आराध्य को सौंप दो। 
We must give hold of our life to our adorable GOD.

संसार में प्रत्येक प्राणी अपने छोटे से जीवन का भरपूर आनंद लेना चाहता है। इसके लिए कोई परिश्रम किए बिना और धन को खर्च किए बिना हमें मात्र निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना है -

- अपनी बुद्धि, मन व विचारों को अपने आराध्य को समर्पित कर दो।

- हमारा मन ही अपने विचारों द्वारा बुद्धि और विवेक पर प्रहार कर के इन्द्रियों से अपनी इच्छानुसार कार्य करवाता है। जब हम अपना मन भगवान को अर्पित कर देंगे, तो हमारा प्रत्येक कार्य उन्हीं के द्वारा निर्देशित होगा।

जैसे एक माँ अपने असहाय नवजात शिशु की सभी आवष्यकताओं व सुविधाओं का ध्यान रखती है उसी प्रकार भगवान अपने प्रतिनिधि गुरु के रूप में हमारी पात्रता के अनुसार सुख-सुविधाओं का ध्यान रखेंगे और हम अपने जीवन को आनन्दपूर्वक व्यतीत कर उन्नति के पथ पर अग्रसर हो सकेंगे। इसीलिए कहा गया है-

“अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में,

है जीत तुम्हारे हाथों में और हार तुम्हारे हाथों में।”

 एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, "गुरुदेव, जीवन में शांति और सफलता का सबसे सरल मार्ग क्या है?"

गुरु मुस्कराए और उसे नदी किनारे ले गए। वहाँ एक छोटी नाव बँधी थी। गुरु ने कहा, "इस नाव पर बैठो और चप्पू (oars) मत चलाओ।" शिष्य बैठ गया। लहरों के थपेड़ों से नाव डगमगाने लगी और एक दिशाहीन सफ़र पर चल पड़ी। शिष्य घबरा गया।  

तब गुरु ने कहा, "अब चप्पू उठाओ और अपनी पूरी ताकत से नाव को किनारे लगाने की कोशिश करो।" शिष्य ने खूब मेहनत की, लेकिन तेज बहाव के कारण वह थक गया और नाव फिर भी सही दिशा में नहीं पहुँच पायी।

अंत में गुरु ने कहा, "अब नाव की डोर (पतवार) मेरे हाथ में दे दो।" जैसे ही शिष्य ने बागडोर गुरु को सौंपी, गुरु ने कुशलता से लहरों का रुख पहचाना और बड़ी सहजता से नाव को सुरक्षित किनारे लगा दिया।

गुरु बोले, "वत्स, यही जीवन है। जब तक तुम अकेले संघर्ष करोगे, थक जाओगे। जब तुम अपनी मर्जी चलाओगे, तो दिशाहीन भटकोगे। लेकिन जैसे ही तुम अपने जीवन की डोर अपने आराध्य (ईश्वर) को सौंप देते हो, वह 'परम मल्लाह' बनकर तुम्हारी नाव को हर तूफान से बाहर निकाल लेते हैं।"

सीख: समर्पण का अर्थ आलस्य नहीं, बल्कि अपनी मेहनत को ईश्वर के चरणों में रखकर परिणामों की चिंता से मुक्त हो जाना है। जब वह साथ होते हैं, तो हर राह आसान हो जाती है।

निष्कर्ष 

ऊपर बताए गए सभी चरणों पर लगातार चिंतन व मनन करने से उनका ज्ञान प्राप्त करके और उनका अभ्यास करके धीरे-धीरे तुम्हारा मन सभी अशुद्धियों, संदेहों, दुराग्रहों, भयों और असंतुष्ट इच्छाओं को नष्ट कर देगा, जो तुम्हारे अवचेतन मन को प्रभावित किए हुए हैं या संस्कार बन कर बैठे हैं और चेतन मन शक्तिशाली, सकारात्मक, पवित्र, संतुलित और पूरी तरह तुम्हारे नियंत्रण में हो जाएगा। तब इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा कि तुम कहां हो, क्या कर रहे हो। तुम हमेशा शांत और प्रसन्नचित्त व समभाव में रहोगे, न आनन्द से उत्तेजित और न दुःखों से पीड़ित। तुम हमेशा अनोखी आन्तरिक शान्ति और दैवीय आनन्द से भरे रहोगे, जिसे न तो भंग किया जा सकता और न किसी बाह्य परिस्थिति के द्वारा प्रभावित किया जा सकता।

सामान्यतया जब हमारा मन कमज़ोर और बिख़रा हुआ होता है और हमारे नियंत्रण में नहीं होता, तब हम इस भवसागर में तिनके की तरह इधर-उधर बहते रहते हैं, कभी हंसते हुए, कभी रोते हुए, कभी प्यार करते हुए, कभी घृणा करते हुए। ऊपर बताए गए चरणों के अभ्यास को अपना कर हम एक स्थिर अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं और अपने आप को चारों गतियों के मध्य नाचने से बचा सकते हैं।

इसीलिए कहा गया है-ख़ुशी का समन्दर, अपने अन्दर।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

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