Avoid fear of death.
मृत्यु के डर को भगाओ। Avoid fear of death.
मृत्यु जीवन की एक प्राकृतिक घटना है और ऐसी घटना है जो प्रकृति के नियमानुसार अवश्यम्भावी है न कि डराने वाली। मृत्यु केवल एक जीवन का दूसरे जीवन में बदलना है। इस दुःखदायी स्थिति की वास्तविकता को समझो और शांत भाव से स्वीकार करो। यह कहा गया है कि जो मृत्यु से नहीं डरता, मृत्यु उससे डरती है। वह मृत्यु को अपनी मुट्ठी में रखता है और एक चेतन मृत्यु से मरता है न कि हम सब की तरह, जो बिना जाने मृत्यु के जबड़े में निगल लिए जाते हैं।
सबसे बड़ा सच
एक शहर में धनी व्यापारी रहता था। उसे मृत्यु का बहुत डर लगता था। जब भी कोई मरता, उसे लगता कि अगली बारी उसकी है। इस डर से उसने खाना-पीना और व्यापार करना छोड़ दिया।
एक दिन, एक ज्ञानी साधु उसके घर आए। व्यापारी ने रोते हुए कहा, “महाराज! मुझे हर पल मौत का डर सताता है। सब कुछ यहीं छूट जाएगा, इस विचार से मैं प्रतिपल मर रहा हूँ।“
साधु मुस्कुराए और बोले, “यह डर तुम्हें मौत से पहले ही मार रहा है। एक छोटा-सा उपाय करो। जब भी मौत का विचार आए, तो जोर से कहना- ’जब तक मौत नहीं आएगी, मैं जीऊंगा’।“
व्यापारी ने ऐसा ही किया। जब भी डर लगता, वह कहता, “जब तक मौत नहीं आएगी, मैं जीऊंगा।“ धीरे-धीरे उसके मन का डर कम हो गया। उसे समझ आ गया कि मौत तो एक निश्चित सत्य है, लेकिन जब तक वह नहीं आती, तब तक जीने का हर पल अनमोल है।
सीखः
मृत्यु का भय इंसान को जीना भुला देता है। डरने से मृत्यु टल नहीं जाती, अपितु जीने का आनंद खत्म हो जाता है। इसलिए, जीवन के हर क्षण को पूरी ऊर्जा से जीएं और मृत्यु को जीवन के स्वाभाविक अंत के रूप में स्वीकार करें।
जैसे ‘महाभारत’ में ‘भीष्म पितामह’ के नाम से विख्यात गंगा-पुत्र देवव्रत ने अपनी भीष्म प्रतिज्ञा के बल पर ही मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी। उन्होंने अपने पिता राजा शान्तनु की ख़ुशी के लिए माता सत्यवती को यह वचन दिया कि ‘वह कभी भी राज्य का अधिकार नहीं मांगेगा और आजीवन ब्र२चर्य व्रत का पालन करेगा ताकि उसकी कोई सन्तान न हो, जो बाद में राज्याधिकार मांगे।’ इस भीष्म प्रतिज्ञा के कारण ही उन्हें ‘इच्छा-मृत्यु’ का वरदान मिला।
अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने भी मृत्यु के डर पर विजय प्राप्त करके ‘चक्रव्यूह’ में प्रवेश करने का साहस किया और वीरगति को प्राप्त कर अपना नाम अमर कर दिया। अतः मृत्यु से डर कर भागने के स्थान पर उसका साहस के साथ सामना करो।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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