Be honest.
अपने कामों के प्रति ईमानदार, सत्यवादी और मार्मिक रहो।Be honest, truthful and righteous in your dealings.
यह दैवीय नियम याद रखो-सत्य कभी गिरता नहीं और झूठ कभी टिकता नहीं। अस्थाई रूप से चाहे तुम असत्य की चकाचौंध से मुग्ध हो जाओ और बेईमानी से मोहित हो जाओ लेकिन अन्त में सत्य ही सफल होता है और जीतता है। सत्य की नाव जीवन की कठिनाइयों में डगमगा सकती है पर डूब नहीं सकती। झूठ, बेईमानी या धोखेबाजी के प्रभाव से किया गया बुरा काम उस व्यक्ति पर अवश्य ही विरुद्ध प्रतिक्रिया करता है, जहां से उस बुरे काम का जन्म होता है। हमारे अच्छे कामों का परिणाम ईनाम द्वारा और बुरे कामों का फल अनिवार्य रूप से दंड के रूप में अवश्य मिलता है।
एक छोटे से गाँव में राम नाम का एक लड़का रहता था। राम बहुत ही ईमानदार और मेहनती था। वह हमेशा सच बोलता और अपने काम में पूरी निष्ठा रखता था। गाँव के लोग उसे बहुत पसंद करते थे क्योंकि वह कभी झूठ नहीं बोलता था और हमेशा दूसरों की मदद करता था।
एक दिन गाँव में एक बड़ी समस्या आई, जब किसी ने अपनी फसल की चोरी की घटना की शिकायत की। सभी लोग परेशान थे कि चोर कौन हो सकता है। राम जानता था कि चोर कौन है, क्योंकि वह उसका ही मित्र था। उसने साहस दिखाते हुए सच बताने का निर्णय लिया। उसने अपने साहस और ईमानदारी से चोरी करने वाले मित्र के विरुद्ध प्रमाण इकट्ठे किए, उसके ठिकाने का पता लगाया और वह उस व्यक्ति को सबके सामने लाया। इससे गाँव में उसके प्रति विश्वास और सम्मान की भावना और भी बढ़ गई।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ईमानदारी सबसे बड़ा गुण है। चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, हमें हमेशा सच बोलना और सही काम करना चाहिए। ईमानदारी से ही व्यक्ति का सम्मान बढ़ता है और समाज में उसकी अच्छी छवि बनती है। राम की तरह हम सबको भी ईमानदार बनना चाहिए ताकि हमारा समाज और देश प्रगति कर सके।
अपने विचारों व कार्यों में अन्दर और बाहर से एक समान बनो। तुम्हारे विचारों, शब्दों और कार्यों में समानता दिखाई देनी चाहिए। यही एक ईमानदार व्यक्ति की सच्ची परीक्षा होगी। लेकिन सामान्यतया आजकल देखा जाता है कि एक व्यक्ति के दो चेहरे होते हैं। एक असली और दूसरा बनावटी, जो केवल दूसरों को दिखाने के लिए होता है। । इसलिए उनका अन्तर्मन का स्वरूप और बाह्य रूप एक दूसरे के अनुरूप नहीं होता। सच को छिपाया नहीं जा सकता। यह एक ऐसी ताकत है जिसे तब तक चैन नहीं मिलता जब तक यह किसी दैवी शक्ति से बाहर नहीं आ जाता।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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