Consider your children as children of God.
अपने बच्चों को भगवान के बच्चे मानो। Consider your children as children of God.
तुम्हारा और तुम्हारे बच्चों का भगवान से एक जैसा रिश्ता है। तुम्हारे बच्चे भी भगवान के प्रति स्वयं प्रत्यक्ष रूप से जवाबदेह हैं न कि तुम्हारे माध्यम से। तुम उनके भाग्य के नियंत्रक नहीं हो। उनका अपना स्वतंत्र भाग्य है। तुम्हारे साथ उनका रिश्ता केवल अस्थाई है। तुम कुछ समय के बाद यह दुनिया छोड़ दोगे। उनका शाश्वत और स्थाई संबंध केवल भगवान के साथ है जो उन्हें असली सुरक्षा दे सकता है।
तुम्हारे बच्चों के प्रति तुम्हारी ज़िम्मेदारी की अपेक्षा भगवान की ज़िम्मेदारी कहीं ज़्यादा है। अपने मन में यह ज्ञान होने के बाद तुम्हें अनावश्यक भावनात्मक संबंधों के बंधन और भ्रामक जुड़ाव को छोड़ कर सेवा-भाव से ही अपने बच्चों का पालन पोषण करना चाहिए ।
एक माँ अपने बेटे की हर गलती पर बहुत आलोचनात्मक थी, जिससे बच्चा दुःखी रहता था। एक दिन उसे अहसास हुआ कि बच्चे भगवान का ही रूप हैं, उनकी सादगी में ईश्वर बसते हैं, न कि अहंकार में। उसने बच्चों को अपना ’माल’ मानने के बजाय ईश्वर की अमानत समझकर प्यार और स्नेह से पालना शुरू किया, जिससे घर का माहौल बदल गया
भगवान के बच्चे
एक नगर में सुमित्रा नाम की महिला रहती थी। वह बहुत ही नियम-धर्म वाली थी, लेकिन अपने छोटे बेटे चिंटू को लेकर बहुत चिंतित रहती थी। चिंटू चंचल था, घर में चीजें इधर-उधर करता था। सुमित्रा हर समय उसे टोकती, चिल्लाती और उसकी गलतियों पर उसे भला-बुरा कहती। चिंटू सहमा-सहमा सा रहने लगा था।
एक दिन घर में सत्यनारायण की कथा थी। पंडित जी ने कथा के बाद कहा, “अपने बच्चों को अपनी बपौती (संपत्ति) न समझें, उन्हें भगवान का बच्चा समझें। वे निर्मल मन के होते हैं, उनमें भगवान का रूप देखें।“
सुमित्रा के मन में यह बात घर कर गई। उस दिन जब चिंटू ने शरारत की, तो सुमित्रा चिल्लाई नहीं। उसने गहरी साँस ली और उसे गोद में उठाकर कहा, “बेटा, तुम तो ठाकुर जी के छोटे रूप हो, तुम ऐसी शरारत कैसे कर सकते हो?“
बच्चे को प्यार से बात समझाई गई। धीरे-धीरे सुमित्रा का व्यवहार बदला। वह बच्चों की गलतियों को सुधारने के लिए उन पर गुस्सा होने के बजाय, प्रेम और धैर्य से उन्हें भगवान के बच्चे की तरह पालने लगी।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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