world is duel in its nature.
दुनिया में हर वस्तु का पक्ष और विपक्ष होता है, दुनिया प्रकृति से ही द्विसूचक होती है। There are pros and cons in every thing of the world, world is duel in
its nature.
यह संसार की परिभाषा है कि वह प्रकृति से ही द्वैत है अर्थात् हर बात के दो पहलू हैं जैसे-दिन-रात, जीवन-मृत्यु, गर्मी-सर्दी, नर-मादा, जवान-बूढ़ा, ख़ुशी-ग़म, सुख-दुःख, संयोग-वियोग। ये दोनों पहलू एक दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। ये सांसारिक वस्तुओं की प्रकृति से ही निर्मित हुए हैं। ये एक सिक्के के दो पहलू हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई वस्तु जो तुम्हें ख़ुशी देती है, वह दुःख भी अवश्य देगी। कोई व्यक्ति या वस्तु, जिसके साथ तुम्हारा संयोग हुआ है, उसका वियोग भी अवश्य होगा या तुम्हें लाभ हुआ है तो तुम्हें कभी न कभी हानि भी सहन करनी होगी।
अंधेरा और रोशनी
एक गाँव में एक बूढ़ा किसान रहता था। उसके पास एक ही घोड़ा था। एक दिन, उसका घोड़ा जंगल में भाग गया।
गाँव वाले आए और बोले, “यह तो बहुत बुरा हुआ!“
किसान ने शांत भाव से कहा, “पता नहीं, क्या अच्छा है और क्या बुरा।“
अगले दिन, उसका घोड़ा वापस आ गया और साथ में तीन जंगली घोड़े भी लाया।
गाँव वाले खुशी से बोले, “वाह! यह तो बहुत अच्छा हुआ! अब आपके पास चार घोड़े हैं।“
किसान ने फिर वही कहा, “पता नहीं, क्या अच्छा है और क्या बुरा।“
तीसरे दिन, किसान का बेटा उन जंगली घोड़ों को पालतू बनाने की कोशिश कर रहा था, तब वह घोड़े से गिर गया और उसका पैर टूट गया।
गाँव वाले आए और दुःखी होकर बोले, “यह तो बहुत बुरा हुआ! अब आपका बेटा कुछ समय तक काम ही नहीं कर पाएगा।“
किसान ने शांत स्वर में कहा, “पता नहीं, क्या अच्छा है और क्या बुरा।“
चौथे दिन, राजा के सैनिक गाँव में आए और सभी स्वस्थ नौजवानों को युद्ध के लिए जबरदस्ती ले जाने लगे। लेकिन, टूटे पैर के कारण किसान के बेटे को वे छोड़ गए।
अब गाँव वालों को समझ आया कि जो उन्हें बुरा लग रहा था, उसमें भी एक अच्छाई छिपी थी।
सीख :
जीवन में कोई भी घटना पूर्णतः अच्छी या बुरी नहीं होती। हर स्थिति के दो पहलू (सकारात्मक और नकारात्मक) होते हैं। इसलिए, किसी एक पहलू को देखकर अंतिम निर्णय नहीं लेना चाहिए।
उदाहरण के लिए जब तुम्हारा विवाह हुआ तो तुम्हें ख़ुशी और लाभ हुआ, लेकिन अवश्य ही कुछ बंधन भी महसूस हुआ होगा, या तुम्हारे पास कहीं कोई मकान हो, जमीन व जायदाद हो तो इससे अवश्य ही तुम्हें लाभ मिलेगा लेकिन इसके साथ कोई तनाव या उत्तेजना भी जुड़ी होगी।
हर वस्तु के साथ यही नियम या स्थिति है। कभी-कभी लोग किसी बात का केवल एक पहलू देखते हैं और अपना निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि यह बहुत अच्छी है या बुरी है। लेकिन वास्तव में वे उसका दूसरा पहलू देखना भूल जाते हैं। इसलिए यह कहा जाता है कि जो दिखता है वह हमेशा वास्तविक नहीं होता।
ऊपर बताए गए नियम दैवीय संतुलन के नियम भी कहलाते हैं। इसलिए इसके अनुसार यदि तुम दुःखों व बेचैनियों से दूर रहना चाहते हो तो तुम्हें ख़ुशियों और ऐश्वर्य से भी दूर रहना होगा। यदि तुम अपमान नहीं चाहते तो तुम्हें प्रशंसा पाने की इच्छा भी छोड़नी होगी।
इस को अनुभव करते हुए सांसारिक ख़ुशियों और भौतिक इच्छाओं में अपनी ख़ुशी कम कर दो। संसार की द्वैत प्रकृति से अपने आप को अप्रभावित रखने के लिए सांसारिक वस्तुओं और घटनाओं के प्रति अनासक्त दृष्टिकोण रखो जैसे तुम केवल दर्शक हो अर्थात् न तो सफलता पर उल्लिसित होओ और न असफलता का रंज करो। लाभ-हानि, सफलता-असफलता, मान-अपमान में समता भाव रखो। एक बार तुम इस मानसिक स्तर पर पहुँच जाओगे, तो तुम इस द्वैतता की जकड़ से आज़ाद हो जाओगे।
शाश्वत ख़ुशी या वरदान, जो विपरीत स्थिति में भी कायम रहती है, वह अन्तरात्मा की गहन विश्रान्ति से आती है। यही सच्ची ख़ुशी है जिसे प्राप्त करने के लिए ध्यान या योगाभ्यास के द्वारा परिश्रम करना चाहिए।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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