Avoid constant bickering
लगातार लड़ना और शिकायत करना छोड़ दें।Avoid constant bickering and complaining.
कुछ लोगों की हमेशा लड़ने और शिकायत करने की आदत होती है, जैसे यह नहीं किया, वह ठीक नहीं है, मुझे यह अच्छा नहीं लगता, मुझे वह अच्छा नहीं लगता, यह या वह काम करने से पहले लोगों को मुझ से पूछना चाहिए आदि आदि। यह अन्तहीन सूची है। उनका थैला लोगों और परिस्थितियों के प्रति शिकायतों से हमेशा भरा रहता है। ऐसे लोग शायद ही किन्हीं अच्छी बातों की प्रशंसा करते होंगे। वास्तव में कोई अच्छी तरह से किया हुआ काम उन्हें ख़ुश नहीं करता। वे अच्छी बातों को तो जल्दी ही भूल जाते हैं। वे केवल जीवन के नकारात्मक पहलूओं को ही महत्त्व देते है। केवल शिकायतें और अन्तहीन शिकायतें। इस मानसिक स्थिति के कारण, वे लगातार तनाव में रहते हैं। यह इसलिए है, क्योंकि तुम किसी व्यक्ति द्वारा किए गए कामों में ग़लतियों की सूची (जो अन्तहीन है) हमेशा बना सकते हो। वास्तव में कोई भी व्यक्ति पूर्ण दक्ष नहीं है।
एक बार एक व्यक्ति अपने जीवन से बहुत दुखी था। वह हर समय अपनी किस्मत, अपने काम और अपने परिवार की शिकायत करता रहता था। उसे लगता था कि पूरी दुनिया उसके खिलाफ है और वह छोटी-छोटी बातों पर दूसरों से झगड़ने लगता था।
एक दिन वह एक प्रसिद्ध संत के पास गया और अपनी सारी परेशानियाँ उनके सामने रख दीं। संत ने उसकी बात सुनी और उससे कहा, "कल सुबह मेरे पास आना, मैं तुम्हें तुम्हारी हर समस्या का समाधान दूँगा।"
अगली सुबह जब वह व्यक्ति आया, तो संत ने उसे एक कटोरा पानी और मुट्ठी भर नमक दिया। संत ने कहा, "इस नमक को पानी में डालो और इसे पी लो।" उस व्यक्ति ने वैसा ही किया, लेकिन वह नमक का कड़वा पानी निगल नहीं पाया और उसे थूक दिया।
संत मुस्कुराए और बोले, "अब मेरे साथ पास की झील पर चलो।" झील के किनारे पहुँचकर संत ने उस व्यक्ति को फिर से मुट्ठी भर नमक दिया और कहा, "अब इसे झील में डाल दो।" व्यक्ति ने नमक झील में डाल दिया। फिर संत ने कहा, "अब इस झील का पानी पियो।"
व्यक्ति ने पानी पिया और उसे वह बहुत मीठा और ताज़ा लगा। संत ने पूछा, "क्या तुम्हें अब नमक का खारापन महसूस हुआ?" व्यक्ति ने कहा, "नहीं महाराज, यह तो बहुत स्वादिष्ट है।"
संत ने समझाया: "जीवन के दुख और मुश्किलें इस नमक की तरह ही हैं। वे हमेशा एक समान रहते हैं। लेकिन हमारे जीवन का कड़वापन इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने 'बर्तन' का आकार कितना बड़ा रखते हैं। यदि तुम्हारा मन छोटा है (एक कटोरे की तरह), तो हर छोटी शिकायत और लड़ाई तुम्हें कड़वाहट से भर देगी। लेकिन यदि तुम अपना मन झील जैसा विशाल बना लो, तो बड़ी से बड़ी मुश्किल भी उसमें खो जाएगी और तुम्हारा जीवन मधुर बना रहेगा।"
वह व्यक्ति समझ गया कि शिकायत करने और लड़ने से केवल उसका अपना जीवन कड़वा हो रहा था। उसने उसी दिन से शांत रहकर सकारात्मकता अपनाने का फैसला किया।
सीख: शिकायत करना और लड़ना हमारी ऊर्जा को नष्ट करता है। जब हम दूसरों को स्वीकार करना और धैर्य रखना सीख जाते हैं, तो हमारा जीवन स्वतः ही सुखद हो जाता है।
चिड़चिड़ाहट में लगातार रहने की बजाय, तुम्हेंं अपने सोचने के ढंग और प्रतिक्रियाओं में कुछ परिवर्तन लाना चाहिए। सबसे पहले किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अच्छे कामों की प्रशंसा करना सीखें। दूसरा, जब भी तुम्हें किसी व्यक्ति के किसी काम में हुई ग़लती की ओर संकेत करना हो, तो इसे बाह्य रूप से (objectively) संकेतित करना चाहिए। विशेषतया लिखित रूप में सावधान रहें, जब यह किसी दफ़्तर के काम से सम्बन्धित हो, क्योंकि यह एक स्वाभाविक ग़लती है और इसे दूर किया जा सकता है। इसके लिए उत्तेजित या भावुक मत बनो यहां तक कि यदि तुम्हें किसी की ग़लती को ठीक करने के लिए उसके ईमानदार न होने के कारण उसके विरुद्ध कोई कदम भी उठाना पड़े तो अपना कर्त्तव्य समझ कर पक्षपात रहित हो कर ही उठाओ। उस व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत ईर्ष्या या बुरी भावना नहीं होनी चाहिए। जहां तक हो सके अपनी प्रबंधन और व्यावहारिक निपुणता का प्रयोग कर के केवल मनोवैज्ञानिक ढंग से उस व्यक्ति को सुधारने का प्रयास होना चाहिए।
इस स्थिति में यदि तुम्हें किसी के विरुद्ध कोई शिकायत है जो तुम्हारा अधीनस्थ नहीं है, बल्कि तुम्हारे समान या तुमसे उच्चस्थ या अन्य विभाग का है, तो मामले को अनुरूप (Reconcile) बनाओ न कि व्यक्तिगत लड़ाई में बदल कर अपने सम्बन्ध ख़राब करो। जैसे भी हो, यदि वह अपने आप को न सुधारे तो उससे ऊँचे अधिकारियों को लिखो। जीवन के अनुभव बताते हैं कि चिड़चिड़ापन दिखाने की अपेक्षा अपने शब्दों को विनम्र और अपने विचारों को मुस्कुराते हुए ढंग में बदलने से दूसरों द्वारा किए गए कामों में आश्चर्यजनक परिवर्तन दिखाई देता है। कृपया याद रखो कि इस जीवन में तुम्हारा उप्ेश्य विभिम लोगों को सही करना नहीं है या बुरे लोगों से उनके व्यवहार के विरुद्ध बदला लेना नहीं है। ये सब काम सारे संसार को न्याय देने वाले और उस पर नियंत्रण रखने वाले भगवान से सम्बन्धित हैं।
तुम्हारा उद्देश्य बाधाओं को पार करके, जो व्यक्ति या परिस्थितियों के रूप में हैं, अपना काम इस प्रकार करना है जिससे कम से कम मात्रा में द्वेष, हिंसा, क्रोध और उनका सामना करने का अवसर पैदा हो। कृपया नोट करो कि चाहे कोई कितना भी बुरा व्यक्ति क्यों न हो लेकिन उसका मुक़ाबला करने का उपाय उसका सामना करना और लड़ना कभी नहीं है। तुम उनसे निपटने के लिए कुछ अन्य नीतिगत रास्ते या तरीके खोज सकते हो। किसी असहमति वाले व्यक्ति या परिस्थितियों से चिड़चिड़ाना कोई बहादुरी या महानता का काम नहीं है। ऐसा तो कोई भी कर सकता है। तुम्हारी महानता अपने को नियंत्रित करके ऐसे यांत्रिक व्यवहार से ऊपर उठने में है।
तुम्हें दूसरों के दुर्व्यवहार से समझौता करने और अपने अपमान का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। कई बार वह काम स्वयं करने में भी लाभ दिखाई देता है क्योंकि व्यक्ति के व्यवहार की अपेक्षा वह काम तुम्हारे लिए अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। तुम अपना काम ख़ुद ठीक करना सीखो न कि इस बात से केवल परेशान होते रहो कि यह किसकी ग़लती है और इसे कौन ठीक करेगा। अवश्य ही तुम कामों को ठीक करके सम्बन्धित व्यक्ति को सूचित कर सकते हो ताकि वह अपनी भूलों के प्रति जागरूक बन सके।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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