Does your conversation end in irritation '

क्या आपकी बातचीत प्रायः व्याकुलता और दिल को जलाने से समाप्त होती है? 
Does your conversation often end in irritation and heart burning?

प्रायः यह देखा जाता है कि यद्यपि लोग अपना वार्तालाप अच्छे अभिप्राय से शुरू करते हैं लेकिन कुछ पलों बाद यह पाया जाता है कि दृश्य बदल गया है। एक तरह की टांग-खिंचाई शुरू हो जाती है जहां हर व्यक्ति दूसरे के ऊपर अपनी उच्चता स्थापित करने का इच्छुक होता है, बजाय कि लाभदायक ज्ञान की अदला-बदली करने के। यह इसलिए घटित होता है क्योंकि लोग अपने झूठे दंभ को सन्तुष्ट करने की चाहना अधिक रखते हैं और बातचीत के उद्देश्य को भूल जाते हैं जिसके लिए वह आरम्भ की गई थी।

समीर और आयशा अक्सर मिलते, पर उनकी हर बात एक अनचाही जंग बन जाती। समीर अपनी उलझनों का व्याकुल शोर लेकर आता और आयशा अपने अनकहे दर्द की तपिश।

एक शाम, जब चाय की प्याली अभी गरम ही थी, पुरानी शिकायतों का सिलसिला शुरू हुआ। "तुम कभी नहीं समझते," समीर ने मेज पर हाथ पटकते हुए कहा। आयशा की आँखों में नमी नहीं, बल्कि एक जलन थी। उसने पलटकर कहा, "समझने के लिए दिल चाहिए, पत्थर नहीं।"

बातें तीखी होती गईं। शब्दों के तीर एक-दूसरे के आत्मसम्मान को छलनी करने लगे। न कोई सुन रहा था, न कोई झुकना चाहता था। अंततः, समीर बिना अपनी चाय छुए उठ खड़ा हुआ। दरवाज़ा जोर से बंद हुआ और कमरे में सन्नाटा पसर गया।

आयशा वहीं बैठी रही, अपनी छाती में उस चिर-परिचित दिल को जलाने वाली टीस को महसूस करते हुए। उनकी हर बातचीत का अंत इसी भारीपन और बेचैनी के साथ होता था। वह समझ गई थी कि जब तक वे एक-दूसरे को 'जीतने' की कोशिश करेंगे, दोनों हर बार हारते ही रहेंगे।

यदि हम बातचीत करते हुए अपने मन में इस वास्तविकता को याद रख सकें कि किसी वार्तालाप का पहला उद्देश्य ज्ञान का लाभदायक आदान-प्रदान है न कि दूसरे पर एक की उच्चता लादना या स्थापित करना तो हम अपना दिल जलाने से अपने आप को काफ़ी हद तक बचा सकते हैं जो अधिकतर बातचीत के अन्त में होता है। सभी सावधानियों के बावजूद, यदि तुम महसूस करते हो कि कोई बहस चिढ़ाने की तरफ बढ़ रही है, उसी अवस्था में उसे रोक देना ही बुद्धिमानी है चाहे तुम्हारे विचार-बिन्दु कितने ही तर्कसंगत क्यों न हों। 

तुम्हें यह भी निश्चित करना चाहिए कि तुम केवल रचनात्मक वार्तालाप में ही शामिल होओ, जो ज्ञान की वृद्धि की ओर बढ़े। यदि तुम महसूस करो कि किसी व्यक्ति द्वारा की गई विशेष बहस, तर्क या वार्तालाप केवल अरचनात्मक है और केवल ताकत और समय को नष्ट करने वाली है तो उसमें भाग मत लो। केवल सहनशील श्रोता बनो और वहाँ से मौका देखते हुए चले जाओ।

जब भी तुम किसी व्यक्ति से बात करते हुए ताल-मेल का अभाव महसूस करो, तो जहाँ तक संभव हो सके उसके साथ बातचीत कम कर दो, बजाय कि हर बार तनाव, चिड़चिड़ापन और दिल जलाने में बातचीत का समापन करो।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

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