Don't waste your energy
दूसरों को संतुष्ट करने में अपनी ताकत व्यर्थ न गंवाओ।Don't waste your energy in satisfying others.
कुछ लोग दूसरों को संतुष्ट व प्रसन्न करने के लिए बड़े-बड़े प्रयत्न करते हैं। लेकिन ऐसे लोग अन्त में बहुत निराश हो जाते हैं, जब बाद में उन्हें पता चलता है कि उनके प्रयत्न व्यर्थ हो गए और कोई भी वास्तव में संतुष्ट नहीं हुआ। इस प्रकार के उद्देश्य की ओर चलना अपना बेवकूफ़ बनाने जैसा है, क्योंकि सच्चाई यह है कि सभी लोगों का तो कहना ही क्या, तुम केवल एक व्यक्ति को भी संतुष्ट नहीं कर सकते। इसका कारण है कि हर व्यक्ति की इच्छाओं और उम्मीदों का अनगिनत भंडार है और एक व्यक्ति की सभी उम्मीदों को संतुष्ट करना असंभव है। यदि कोई ऐसा है जिसे तुम संतुष्ट कर सकते हो, वह केवल तुम ख़ुद हो और अन्य कोई नहीं। इसी प्रकार अन्य व्यक्ति भी केवल अपने आप से ही संतुष्ट हो सकता है और किसी अन्य व्यक्ति से नहीं।
एक गाँव में एक मूर्तिकार रहता था जो बहुत अद्भुत मूर्तियाँ बनाता था। एक बार उसने एक पत्थर से बहुत सुंदर स्त्री की प्रतिमा गढ़ी।
वह उसे बाज़ार ले गया। एक राहगीर रुका और बोला, "मूर्ति सुंदर है, पर नाक थोड़ी लंबी है।" कलाकार ने अगले दिन नाक छोटी कर दी। फिर दूसरा आया, उसने कहा, "आंखें थोड़ी बड़ी होनी चाहिए थीं।" कलाकार ने आँखें बदल दीं।
हर दिन कोई न कोई आता और अपनी सलाह दे जाता। अंत में, सबकी बात मानते-मानते वह मूर्ति इतनी अजीब दिखने लगी कि उसे कोई मुफ्त में लेने को भी तैयार नहीं था।
हताश होकर मूर्तिकार ने उस मूर्ति को तोड़ दिया और एक नई मूर्ति बनाई। इस बार जब लोग उसे सलाह देने आए, तो उसने मुस्कुराकर कहा, "यह मूर्ति वैसी ही है, जैसा मेरा अंतर्मन चाहता है।" ताज्जुब की बात यह थी कि वही मूर्ति सबसे ऊँचे दाम पर बिकी।
सीख: यदि आप सबको खुश करने की कोशिश करेंगे, तो आप अपनी मौलिकता और शक्ति दोनों खो देंगे। अपनी ऊर्जा दूसरों के 'सर्टिफिकेट' लेने में नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने में लगाएँ।
इसलिए लोगों को ख़ुश और संतुष्ट करने की कोशिश में अपना समय और शक्ति व्यर्थ न गंवाओ। ये बातें हमेशा तनाव की ओर ले जाती हैं। ख़ुशी, मन की प्राकृतिक और प्रयासहीन स्थिति है। ख़ुशी दूसरों को बलपूर्वक नहीं दी जा सकती या थोपी नहीं जा सकती। जब तुम्हारा मन शांत और मौन होता है और सभी नकारात्मक भावनाओं से आज़ाद होता है, तुम अपने आप ही ख़ुशी महसूस करते हो। ख़ुशी कोई वस्तु नहीं है जो किसी को दी जा सकती हो। यह एक भावना है, जो व्यक्ति को अपने अन्दर ही अनुभव होती है। दूसरों को प्रसन्न करने के लिए तुम सबसे बड़ी भागीदारी यह दे सकते हो कि तुम पहले अपने आप को ख़ुश व उल्लसित करो ताकि तुम से निकलने वाली तरंगें दूसरों को भी उस स्थिति में ले आएं।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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