कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन
“कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन”
वे दिन भी क्या दिन थे,
वे दिन भी क्या दिन थे।
वह सुबह-सवेरे जग जाना,
वह मित्र-मिलन को अकुलाना।
उठा बैग को कांधे पर,
वह दौड़ स्कूल की ओर लगाना।
वह दोस्तों के टिफिन के लंच का स्वाद,
वह शोर मचाने पर टीचर की डाँट।
खेलने का घंटा लगता था छोटा,
पढ़ाई का पीरियड तो लंबा ही होता।
करते शरारत तो मिलती सज़ा,
टीचर की डाँट का अलग था मज़ा।
वे दिन भी क्या...................।
टीचर न आने पर हवाई जहाज़ थे उड़ाते,
टीचर के आने पर चुप बैठ जाते।
एक्टिविटी किट जो घर भूल आते,
तो दोस्तों के संग प्रोजैक्ट बनाते।
‘साॅरी टीचर’ सज़ा से बचाती,
प्रोजैक्ट में अच्छे Marks दिलाती।
वे दिन भी क्या...................।
लैब में वह ड्रोन बनाना,
गणतंत्र-दिवस पर उड़ा कर दिखाना।
सबके साथ मिलकर, वह जन-गण-मन गाना।
स्कूल में हम राजा थे,
खूब मौज उड़ाते थे।
वे दिन भी क्या...................।
‘हाॅली डे’ की न्यूज़ से,
नई उमंग आती थी।
घर में तो होम-वर्क की
याद भी न आती थी।
रोज़ नयी शिक्षा से,
आगे बढ़ते जाते थे।
वे दिन भी क्या...................।
अब दी है चुनौती जो हमको विधाता,
हटेंगे न पीछे ये सबका है वादा।
‘कोरोना’ ने हमको सिखा दिया है,
बुरा है क्या और भला भी क्या है?
आज निकट है माँ और टीचर है दूर,
पर उनके मन में है प्यार भरपूर।
अब समझ में आता है, टीचर से कैसा नाता है?
on line हमको जो,
रोज़ पाठ पढ़ाता है।
चुस्त दिल-दिमाग़ अब सुस्त हो गया।
जैसे कीमती सामान है कहीं पे खो गया।
हमने तो सीखा है घर का ये खाना।
दीनों व दुःखियों पे करुणा बरसाना।
भूल गए थे रीति-रिवाज़।
अनुशासन, नियम और साझा समाज।
किया है नेचर ने फिर से शृंगार।
बागों में आई है फिर से बहार।
सब के मन को महकाया हेै।
नया सवेरा आया है।
अब नया सवेरा आया है।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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